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अफरात जल के बावजूद क्यों मचती है पानी की अफरा-तफरी?

देश में पर्याप्त पानी उपलब्ध है, लेकिन गलत नीतियां अपना कर आम लोगों को पानी के संकट में डाल दिया जाता है। जैसे-जैसे गर्मी का महीना नजदीक आ रहा है देश के कई हिस्सों में पेयजल के संकट की बात भी उभरने लगी है। - डॉ. दिनेश प्रसाद मिश्रा

 

नवीनतम आंकड़े के मुताबिक यूरोप के किसी भी शहर की तुलना में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता दिल्ली में अधिक है। चीन की आबादी भारत से थोड़ी ही कम है, लेकिन चीन भारत की तुलना में आज भी 30 प्रतिशत कम पानी का उपयोग कर रहा है। कहने का आशय यह है की पानी की उपलब्धता के मामले में भारत अव्वल है, लेकिन गलत नीतियों के कारण देश का अधिकांश हिस्सा पानी के संकट से सदैव घिरा रहता है। हाल के वर्षों में दिल्ली सरकार की  अदूरदर्शी पानी नीति के कारण देश की राजधानी भी जल संकट की चपेट में  जाती रही है। वोट की राजनीति के चलते दिल्ली की वर्तमान सरकार ने एक खास वर्ग को खुश करने के लिए  मुफ्त पानी दिए जाने का ऐलान कर रखा है। सवाल है कि जब सब कुछ मुफ्त में बांटा जाएगा तो गुणवत्तापूर्ण उपलब्धता का लक्ष्य कैसे हासिल हो सकेगा?

भारत में लगभग 80 प्रतिशत पानी का उपयोग खेती के काम में किया जाता है। बाजरा और रागी जैसी फैसले बीना सिंचाई के ही पैदा हो जाती है। इसी तरह गेहूं और चावल जैसी फसलों को दो या तीन पानी दे दिया जाए, तो ठीक-ठाक पैदावार हो जाती है। लेकिन जब अंगूर, गन्ना और लाल मिर्च की खेती करनी हो तो उसमें कम से कम 12 से लेकर 20 बार तक पानी देने की जरूरत पड़ती है। कई एक कृषि वैज्ञानिकों का यह मानना है की ऐसी फसलों के खेती के कारण देश में पानी का संकट पैदा होता रहा है। उत्तर प्रदेश में गन्ना, कर्नाटक में अंगूर और राजस्थान में लाल मिर्च की खेती के लिए किसान भारी मात्रा में पानी का उपयोग करते रहे हैं। स्वाभाविक रूप से हर किसान का यह प्रयास होता है की खेती के जरिए वह ज्यादा से ज्यादा लाभ अर्जित कर पाए। किसान हिसाब लगाता है कि यदि एक अतिरिक्त सिंचाई करने से उसका खर्च कितना बढ़ता है और उसे बढ़े हुए खर्चे से तैयार होने वाली फसल में लाभ कितना अधिक बढ़ पाता है। अगर उसे लाभ की मात्रा थोड़ी भी अधिक दिखाई देती है तो वह पानी के उपयोग में किंचित संकोच नहीं करता। इसे हम इस तरह आसानी पूर्वक समझ सकते हैं कि यदि किसान को गन्ना उत्पादन करने हेतु सिंचाई पर खर्च 10,000 रूपये आता है और उसका गन्ना 12,000 रूपये में बिकता है तो वह गन्ना की खेती करता रहेगा। लेकिन यदि उसका खर्च 15,000 रूपये आता है और गन्ना 12,000 रूपये में बिकता है तो निश्चित रूप से वह गन्ने की खेती बंद कर किसी अन्य फसल की ओर कदम बढ़ाएगा। ऐसी स्थिति में वह उन फसलों पर अधिक ध्यान देगा जिसमें सिंचाई के खर्च कम से कम हो।

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर पानी सस्ता होगा तो किसान उसका उपयोग अधिक करेगा। दिल्ली में केजरीवाल सरकार के मुफ्त पानी की बात छोड़ भी दें तो हमारे देश में नहर का पानी अभी भी बहुत सस्ता है। किसान अपने खेत के रकबा के हिसाब से नहर के पानी का एक बार मूल्य अदा कर देता है और उसके बाद वह जितनी बार चाहे उतनी बार अपनी खेतों की सिंचाई करता रहता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे किसी होटल में अनलिमिटेड थाली का मूल्य। अनलिमिटेड थाली वाली व्यवस्था में ग्राहक एक थाली का पैसा एक बार अदा कर देता है और उसके बाद जितनी चाहे उतनी रोटियां खाता रहता है। इस तरह की व्यवस्था हमारे देश में किसानों को पानी की अधिक खपत करने वाली फसलों की खेती करने का मौका प्रदान करती है। क्योंकि उसे पानी का मूल्य एक बार ही अदा करना है, इसलिए वह अनगिनत बार सिंचाई वाली फसलें करता रहता है। इसी तरह मुफ्त या सस्ते बिजली उपलब्ध होने के कारण ट्यूबेल से भी पानी निकलना अन्य देशों की तुलना में भारत में अपेक्षाकृत बहुत सस्ता है। यहां यह सवाल खड़ा हो सकता है कि लाभ के मोर्चे पर पहले से ही परेशान किसान के ऊपर अगर पानी के दाम का अतिरिक्त बोझ डाल दिया जाए तो क्या यह उचित होगा? इस प्रश्न का सीधा उत्तर यह हो सकता है कि पानी की कम खपत करने वाली फसलों का समर्थन मूल्य अगर सरकार बढ़ा दे तो संभव है कि किसान कम पानी वाली फसलों की ओर अग्रसर होंगे। उत्तर प्रदेश में गन्ने की जगह किसी अन्य फसल का समर्थन मूल्य बढ़ जाए तो निश्चित रूप से किसान गन्ना छोड़कर कम खर्च वाली अन्य फसलों की खेती करने लगेंगे। केंद्र सरकार ने श्रीअन्न योजना के तहत मोटे अनाजों को बढ़ावा देना प्रारंभ किया है। बाजरा और रागी जैसे फसलों का समर्थन मूल्य थोड़ा अधिक बढ़ा दिया जाए तो निश्चित रूप से किसान ऐसी फसलों की खेती आगे बढ़कर करने लगेगा।

हमारे देश में पानी के संकट का एक अन्य कारण बड़े बांधों में पानी का भंडारण करने की नीति भी है। बड़े-बड़े बांधों में कई कई किलोमीटर तक पानी का भंडारण किया जाता है लेकिन इस भंडारण वाले पानी पर धूप की किरणें पड़ने से पानी का वाष्पीकरण होता रहता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भंडारण किए गए पानी में से 15 से 20 प्रतिशत पानी वाष्पीकरण के जरिए हवा में उड़ जाता है। इसी तरह नहर से खेत तक पानी पहुंचाने में वाष्पीकरण भी होता है तथा मेंड़ टूटने के कारण अधिकांश पानी का रिसाव होता रहता है। 20 से 25 प्रतिशत तक पानी बर्बाद हो जाता है।

सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के अनुसार जमीनी तालाबों में आधिकाधिक पानी का भंडारण किया जा सकता है। मालूम हो कि जमीनी तालाबों में पड़े पानी का एक तो वाष्पीकरण नहीं होता तथा इसके पानी को मनचाहे स्थान पर ट्यूबवेल से निकाला जा सकता है। हमें पानी के लिए अलग से नहर बनाने की जरूरत नहीं होती। ट्यूबवेल अधिक होने सेबिजली का खर्च तो बढ़ सकता है लेकिन सौर ऊर्जा के जरिए इस खर्च को भी कम किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि जमीनी तालाबों में वर्षा के पानी का आधिकाधिक भंडारण किया जाए। खेत के चारों तरफ मेड बनाकर उसमें वर्षा का पानी जमा करने से जमीनी तालाबों का पुनर्भरण अपने आप होता रहेगा। सरकार को भी इस कार्य के लिए किसानों की सहायता करनी चाहिए तथा किसानों को साथ लेकर इस हेतु कारगर योजना पर काम किया जाना चाहिए।

विडंबनापूर्ण है कि आज देश के हर हिस्से में सभी को पर्याप्त चीनी चाहिए और बड़ी मात्रा में शराब की भी जरूरत बताई जाती है। ऐसे में चीनी और शराब की जरूरत को पूरा करने के लिए निश्चित रूप से गन्ने की खेती का रकबा लगातार बढ़ता जाएगा भले ही नहाने अथवा पीने की पानी की किल्लत होती रहे।

सौ टके की बात यह है कि देश में पर्याप्त पानी उपलब्ध है, लेकिन गलत नीतियां अपना कर आम लोगों को पानी के संकट में डाल दिया जाता है। जैसे-जैसे गर्मी का महीना नजदीक आ रहा है देश के कई हिस्सों में पेयजल के संकट की बात भी उभरने लगी है। ऐसे में आवश्यक है कि देश के शासन सत्ता में बैठे नीति निर्माताओं को एक लाभकारी नीति के साथ आगे आना होगा ताकि अफरात पानी  होने के बावजूद देश के किसी भी हिस्से में पानी की अफरा-तफरी न मचे। पीने नहाने सहित जरुरी कार्यों के लिए पानी की आवश्यक मात्रा हर व्यक्ति को मुहैया कराई जा सके।         

(लेखक वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी हैं।)

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