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प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना: इरादा खेत से सीधे बाजार का

ग्रामीण सड़कों का विस्तार होने से सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर असर पड़ा है। बच्चों और खासकर बालिकाओं की शिक्षा का प्रसार हुआ है। सड़कों के अलावा अस्पताल और रेलवे स्टेशनों और बाजारों तक पहुंच बढ़ी है। व्यापारियों की आवक बढ़ने से उपभोक्ता सामग्री का उपभोग भी बढ़ा है। स्थानीय कौशल के उत्पादों के कारण बाहरी पूंजी निवेश में भी वृद्धि हुई है। — शिवनंदन लाल

 

सरजमीने हिंद पर आवामे आलम के ‘फिराक’/काफिले बसते गए, हिन्दोस्तां बनता गया। बहुत ही थोड़े शब्दों में फिराक गोरखपुरी ने भारत निर्माण, भारत के विस्तार की कहानी बयान कर दी है। ये काफिले, ये बस्तियां, ये गांव बस नहीं पाते यदि इन्हें रास्ते न मिले होते। भारत के विस्तार की असली कहानी इन्हीं रास्तों से होकर निकलती है जो देश के दूर-दराज तक जाती है। इन्हीं रास्तों से हम देश की अंतरात्मा तक प्रवेश करते हैं और अब इन्हीं रास्तों से निकलकर लोग गांव से शहरों में आ रहे हैं। यानी संपर्क में रहना इंसान की फितरत है तो सड़कें उसका स्त्रोत।

सड़कों के जरिए एक दूसरे को करीब लाने में मदद मिली है। इससे माल सेवा और रोजगार के नए बाजार खुले हैं। आज दुनिया एक दूसरे के करीब आने को बेताब है। हमारा अपना अनुभव है कि जो बेहतर तरीके से जुड़ा है वह विकसित और संपन्न है, जिसके संपर्क सूत्र ठीक से नहीं जुड़ पाए, वह इस दौड़ में पीछे रह गया है। जो गांव शहरों में तब्दील हो रहे हैं उसकी सबसे बड़ी वजह है, उनकी कनेक्टिविटी। रेल लाइन, टेलीफोन, बिजली, पानी, इंटरनेट और सबसे बढ़कर सड़क, इस संपर्क के बुनियादी मापदंड है। क्योंकि उनके साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार व नागरिक सुविधाएं जुड़ी हैं।

भारत में विकास के लिए उचित सड़क नेटवर्क की जरूरत को आजादी के पहले ही समझ लिया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भविष्य की जरूरतों को देखते हुए तत्कालीन भारत सरकार ने अलग-अलग प्रांतों के चीफ इंजीनियरों का एक सम्मेलन सन् 1943 में नागपुर में बुलाया था। आधुनिक भारत में सड़कों के विकास का यह पहला समन्वित कार्यक्रम था। इसके अंतर्गत देश की सड़कों को चार वर्गों में बांटा गया - पहला, राष्ट्रीय राजमार्ग, दूसरा राज्य राजमार्ग, तीसरा मुख्य जिला सड़के और चैथा ग्रामीण सड़कें। इनमें बाद की दो श्रेणियां ग्रामीण सड़क व्यवस्था से जुड़ी है। सड़कों को लेकर नागपुर के बाद मुंबई और लखनऊ प्लान आए। देश का कुल सड़क नेटवर्क इस वक्त लगभग 50 लाख किमी. के आसपास है, जिनमें ग्रामीण क्षेत्र के 30 लाख किमी. के करीब है। सन 2000 तक देश के 1500 से ज्यादा आबादी वाले गांवों को सड़कों से जोड़ दिया गया था। 1000 से 1500 के बीच की आबादी वाले 86 प्रतिशत गांव सड़क मार्ग से जोड़ने का लक्ष्य प्राप्त करने की स्थिति में थे। इसके बाद सरकारी लक्ष्यों में निरंतर सुधार होता गया। जनवरी 2000 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय विकास की भारी जरूरतों और गांव से शहरों की ओर होते तेज पलायन को देखते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण सड़क विकास समिति का गठन किया। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर ही प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना का जन्म हुआ। जब यह योजना शुरू हुई उस समय देश की लगभग 40 प्रतिशत बस्तियां बारहमासी सड़कों से नहीं जुड़ी हुई थी। यानी देश की 75 प्रतिशत आबादी का राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से सीधा संपर्क नहीं था। जो थोड़ी बहुत सड़कें थी भी, तो उनका रखरखाव का इंतजाम नहीं के बराबर था। स्थिति को सुधारने के लिए 25 दिसंबर 2000 को केंद्र द्वारा प्रायोजित प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना शुरू हुई। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों के अलावा अन्य सडकंे राज्य सूची का विषय है, परंतु यह योजना एक विशेष हस्तक्षेप के रूप में असंबद्ध बस्तियों को ग्रामीण संपर्क नेटवर्क प्रदान कर ग्रामीण क्षेत्रों का सामाजिक, आर्थिक सशक्तिकरण करने के उद्देश्य से शुरू की गई। योजना के अंतर्गत जनसंख्या का आकार मैदानी क्षेत्रों में 500 और उत्तरी पूर्वी राज्यों हिमालयी राज्यों मरुस्थलीय और जनजाति क्षेत्रों में 250 निर्धारित किया गया।

इरादा खेत से सीधे बाजार तक सड़क संपर्क सुनिश्चित करने का है। ग्रामीण सड़क विकास विजन 2025 में ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों से न जुड़ी बसावटों को आवश्यक पुलिया, ड्रेनेज की मदद से बारहमासी सड़कों से जोड़ना था। इस कार्यक्रम के लिए इकाई राजस्व गांव अथवा पंचायत न होकर एक बसावट या बस्ती है। ग्राम, ढाढ़ी, पुरवा मजरा आदि।

ग्रामीण सड़कों का विस्तार होने से सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन पर असर पड़ा है। बच्चों और खासकर बालिकाओं की शिक्षा का प्रसार हुआ है। सड़कों के अलावा अस्पताल और रेलवे स्टेशनों और बाजारों तक पहुंच बढ़ी है। व्यापारियों की आवक बढ़ने से उपभोक्ता सामग्री का उपभोग भी बढ़ा है। स्थानीय कौशल के उत्पादों के कारण बाहरी पूंजी निवेश में भी वृद्धि हुई है। चूंकि सड़कों का विस्तार व्यक्तियों को जोड़ता है। ग्राहकों के पास चुनने का विकल्प होता है तो उत्पादक के पास अपना माल बाहर ले जाकर बेचने के मौके भी होते हैं। सड़कों के बनने से सबसे बड़ा प्रभाव परिवहन लागत में कमी के रूप में आता है। इससे वस्तुओं के दाम में कमी तो आती ही है, सब्जियां, फल, दूध, दही, दूसरे अन्य कृषि उत्पाद, डेरी उत्पाद शहरों को मिलते हैं। सड़कंे अगर पलायन को बढ़ावा देती है तो यही सड़कंे पलायन को रोक भी सकती है। सीधी सी बात है कि अपने घर गांव में ही रोजगार उपलब्ध हो तो कोई बाहर क्यों जाएगा?

इस योजना का सर्वाधिक लाभ गांवों को होने का अनुमान है। गांव के छोटे किसान अब शहरों से सीधे जुड़ कर अपनी फसलों फसलें बेच सकेंगे तथा फसलों के लिए उचित दाम पर आवश्यक खाद बीज भी प्राप्त करेंगे। इस योजना से ग्रामीण स्तर पर ही रोजगार सृजित होने की प्रबल संभावनाएं हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत रेल क्रॉसिंग और तिराहों पर ओवरब्रिज बनाने का काम भी शामिल है, इससे भी लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे। भारत सरकार ने ‘मेरी सड़क’ नाम से एक सरकारी ऐप जारी किया है। व्यवस्था यह है कि अगर आपके गांव की सड़क अभी तक नहीं बनी है या किसी कारण से खराब हो गई है तो आप इस ऐप के जरिए सीधे प्रधानमंत्री से शिकायत कर सकते हैं।

बेशक प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर संबंधित योजना बनी है, पर ग्रामीण सड़कों का निर्माण कई तरह के अन्य कार्यक्रमों के जरिए भी होता है। इसमें महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना, एमपी लैंड, आपदा राहत तथा अन्य स्थानीय कार्यक्रम भी प्रमुख रूप से जुड़े हैं। इनमें स्थानीय एजेंसियों की भूमिका ज्यादा होती है। हालांकि इसके लिए राष्ट्रीय राज्य स्तरीय और स्थानीय व्यवस्था बनाई गई है फिर भी इसके समन्वय को लेकर समुदायों को साथ लेकर चलने की जरूरत है। स्थानीय स्तर पर पंचायतों की भूमिका पढ़ाना भी इसके लिए लाभप्रद होगा।

इस बीच केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज्यमंत्री ने राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में बताया है कि इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य असंबद्ध बस्तियों को सड़क नेटवर्क प्रदान करना है। योजना के प्रारंभ होने से अब तक लगभग डेढ़ लाख बस्तियों को आपस में जोड़ने के लिए सवा छह लाख किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण किया जा चुका है। इन सड़कों में लगभग सवा दो लाख किलोमीटर से अधिक लंबाई की सड़कें 10 साल पुरानी है जबकि डेढ़ लाख किलोमीटर सड़कें 5 साल तक पुरानी है। यानी कुल मिलाकर 60 प्रतिशत सड़कों के उचित रखरखाव की जरूरत है। मंत्रालय के एक अनुमान के अनुसार योजना के तहत निर्मित सड़कों के रखरखाव के लिए वर्ष 2021-22 से प्रारंभ होकर अगले 5 वर्षों के दौरान 75 हजार से लेकर 80 हजार करोड रुपए खर्च करने की आवश्यकता होगी। राज्यों द्वारा चालू वित्त वर्ष में 11 हजार 500 करोड़ रुपए खर्च करने की आवश्यकता है और वित्त वर्ष 2024-25 तक आवश्यक राशि बढ़कर 19 हजार करोड ़रूपये होने का अनुमान है।

लेखक आकाशवाणी में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी है।

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विश्व खाद्य सुरक्षा दिवसः सुरक्षित भोजन-बेहतर स्वास्थ्य

वर्ष 2030 तक भुखमरी मिटाना और सभी लोगों विशेषकर गरीब और लाचारी की स्थिति में जी रहे लोगों को भोजन सुलभ कराना कुपोषण के हर रूप को मिटाना जिसमें 5 वर्ष से छोटे बच्चों में बौनेपन पर और क्षीणता के बारे में भी अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करना शामिल है। — शिवनंदन लाल

 

विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस। जुलाई 2017 में खाद्य एवं कृषि संगठन के 40वें सत्र में इसका प्रस्ताव आया था, जिस पर संयुक्त राष्ट्र संगठन के 73वें सम्मेलन में समीक्षा के बाद प्रत्येक वर्ष 7 जून को विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस मनाने की घोषणा की गई थी । विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस का उद्देश्य खाद्य सुरक्षा, मानव स्वास्थ्य और सतत विकास के योगदान से हर हाथ को काम तथा हर पेट को सुरक्षित भोजन का लक्ष्य हासिल करना है। इस लक्ष्य के प्रति लोगों में जागरूकता लाने के लिए हर साल एक थीम जारी की जाती है। इस बार विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस 2022 की थीम “सुरक्षित भोजन-बेहतर स्वास्थ्य“, है जो मानव सेहत को सुनिश्चित करने में सुरक्षित और पौष्टिक भोजन की भूमिका पर प्रकाश डालती है।

अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी का प्रसिद्ध वक्तव्य है, ‘भूख के खिलाफ मानवता की जंग आजादी का असली जंग है।’ तो ऐसे में सवाल है कि क्या हम मानवता की इस आजादी को हासिल कर चुके हैं?

दुनिया के हर व्यक्ति का पेट भरने लायक पर्याप्त भोजन मौजूद होने के बावजूद आज हर 9 में से एक व्यक्ति भूखा रहता है। इन लाचार लोगों में से दो तिहाई लोग एशिया में रहते हैं। अगर हमने दुनिया की आहार और कृषि व्यवस्थाओं के बारे में गहराई से नए सिरे से नहीं सोचा तो अनुमान है कि 2050 तक दुनिया भर में भूख के शिकार लोगों की संख्या 2 अरब के पार पहुंच जाएगी। हालांकि विकासशील देशों में कुपोषित लोगों की संख्या में कमी आई है। सन 1990-92 के दौरान यह 23.3 प्रतिशत थी जो 2018-20 के दौरान घटकर 12 प्रतिशत पर आ गई है। लेकिन लगभग 100 करोड़ लोग आज भी अल्प पोषित हैं।

दक्षिण एशिया में भुखमरी का बोझ अभी सबसे अधिक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के 75 साल होने पर भी भारत में महिलाओं बच्चों में भूख और पोषण का स्तर चिंताजनक है। वैश्विक भूख सूचकांक, वैश्विक पोषण रिपोर्ट, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण आदि स्त्रोतों के आंकड़े भारत में भूख और कुपोषण में लिपटी बहुजन की बदहाली को बयान करते हैं जो अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के मुताबिक आजादी के वक्त से अब तक जस की तस कायम है।

साल 2011 की जनगणना में भारत की आबादी लगभग 120 करोड़ थी जो कि वर्ष 2030 तक 160 करोड़ हो जाने का अनुमान है। तब भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश होगा। ऐसे में पेट का पहाड़ हो जाना लाजमी होगा।

मानव इतिहास के वर्तमान दौर में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सभी स्तरों पर राज्य की सर्वमान्य अवधारणा एक कल्याणकारी राज्य की है। लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता राज्य की स्थापना करती है और राज्य का यह दायित्व है कि वह जनता के कल्याण का पूरा ध्यान रखें। संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों को समाज का मुख्य आधार माना जाता है जो राज्य की संवैधानिक प्रतिबद्धताओं को इंगित करता है तथा यहां स्थापित करता है कि खाद्य सुरक्षा की गारंटी प्रदान करना राज्य का पहला कर्त्तव्य है। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है। जीवन के अधिकार से भोजन का अधिकार संपृक्त है क्योंकि जिस तरह जीने के लिए सांस जरूरी है उसी तरह जीने के लिए भोजन भी आवश्यक है। संविधान का अनुच्छेद 47 कहता है कि लोगों के पोषण और जीवन स्तर को उठाने के साथ-साथ जन स्वास्थ्य को बेहतर बनाना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून की प्रस्तावना में लिखा है कि खाद्य सुरक्षा कानून मानव जीवन चक्र पर आधारित है इसका उद्देश्य लोगों को जीवन जीने के लिए उस कीमत पर जो उनके सामर्थ में हो पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण भोजन व पोषण सुरक्षा देना है, ताकि लोग सम्मान एवं गरिमा के साथ जीवनयापन कर सकें। इस कानून के तहत प्राथमिकता वाले परिवारों को प्रति व्यक्ति के हिसाब से हर महीने राशन उपलब्ध कराया जाता है। कोरोना काल के दौरान सरकार ने देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन मुहैया कराया। बढ़ती खाद्य जरूरतों को देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान के तहत खाद्य फसलों का उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए पहल की है। खेती के रकबे का विस्तार चावल गेहूं और दालों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए वर्ष 2007 में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान के तहत रोजगार के अवसर पैदा करने मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार करने तथा कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कार्य योजना तैयार की गई थी। वर्ष 2014-15 से वाणिज्य फसलों पोषक तत्वों वाले अनाज तथा मोटे अनाज को भी इसमें शामिल कर लिया गया। यह अभियान 25 मिलियन टन अतिरिक्त खाद्यान्न उत्पादन के लक्ष्य के साथ 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान जारी रखा गया था। इसके तहत 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक 10 मिलियन टन चावल, 8 मिलियन टन गेहूं, 4 मिलियन टन दलहन और तीन मिलियन टन  मोटे अनाज का अतिरिक्त उत्पादन लक्ष्य हासिल करना था। 12वीं योजना के बाद इस अभियान को 13 मिलियन टर्न खदान के नए अतिरिक्त लक्ष्य के साथ जारी रखा गया था इसके अंतर्गत वर्ष 2017-18 से वर्ष 2020 तक 5 मिलीयन टन चावल, 3 मिलीलीटर गेहूं, 3 मिलीयन टन दालें और 2 मिलियन टन पोषक तत्वों वाले मोटे अनाज का अतिरिक्त उत्पादन का लक्ष्य रखा गया। इस अभियान के तहत अधिक उपज देने वाली किस्मों के बुआई के बीज वितरण, कृषि मशीनरी संसाधन संरक्षण, मशीनरी उपकरण, कुशल जल अनुप्रयोग, उपकरण, पौधा संरक्षण पोषक तत्व प्रबंधन और किसानों को फसल प्रणाली आधारित प्रशिक्षण आज प्रदान किए गए। वर्ष 2020 में किस से किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से प्राथमिक प्रसंस्करण इकाइयों छोटे भंडारण केंद्र लचीले हस्तक्षेप को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार इस अभियान में जोड़ा गया है। इस अभियान में बीज प्रतिस्थापन दर और प्रजातीय प्रतिस्थापन में सुधार के लिए ध्यान केंद्रित किया गया है तथा नवीनतम किस्मों की छोटी कीट को केंद्रीय बीज एजेंसियों के माध्यम से किसानों के घर पर मुफ्त में वितरित किया जा रहा है। प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक 2020 तक हाइब्रिड किस्मों के लगभग 74 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरित किए गए थे। हर खेत को पानी और प्रति बूंद अधिक फसल के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए 2020 तक के एन.एफ.एस.एम. के तहत किसानों के बीच 274600 पंपसेट और 126967 पानी का छिड़काव करने वाले यंत्र तथा पानी ले जाने वाले लगभग 764 लाख मीटर पाइप वितरित किए गए।

भारत सरकार द्वारा किए गए ठोस प्रयासों के परिणाम स्वरुप 2014-15 में कुल खाद्यान्न उत्पादन 252 मिलियन टन से बढ़कर 2020 के दौरान 297 मिलियन टन हो गया है जो कि 17.80 प्रतिशत की वृद्धि दिखाता है। खाद्यान्नों की उत्पादकता 2014-15 में 2028 किलोग्राम हेक्टेयर थी जो 2020 के दौरान बढ़कर 2325 किलोग्राम प्रति हेक्टर हो गई है जो कि 14.70 प्रतिशत की वृद्धि है। दलहन के क्षेत्र में लगभग 35 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।

तमाम प्रयास के बावजूद वैश्विक भूख सूचकांक में भारत की स्थिति चिंताजनक है। देशभर में 5 साल से कम उम्र के 38 प्रतिशत बच्चे ठिगनापन के शिकार हैं वहीं 21 प्रतिशत बच्चे अति कमजोर की श्रेणी में है जिनका वजन बहुत ही कम है जो कि इनके कुपोषण का इशारा करती है । संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत में 40 प्रतिशत खाना बर्बाद हो जाता है। एक अन्य आंकड़े के मुताबिक आस्ट्रेलिया एक साल में जितना गेहूं पैदा करता है उतना गेहूं भारत में समुचित भंडारण के अभाव में हर साल बर्बाद हो जाता है। यानि कि भंडारण के अभाव में लाखों टन अनाज सड़ जाता है जबकि दूसरी और करोड़ों भारतीयों को भूखे पेट सोना पड़ता है।

एक कहावत है कि भूखे भजन न होय गोपाला। मतलब भूखे पेट भगवान का भजन भी नहीं हो सकता फिर सबसे बड़ी भूखी और कुपोषित आबादी वाला यह देश अपनी आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक तरक्की कैसे सुरक्षित रहेगा। इसलिए अगर हम खुद को विश्व महाशक्ति के रूप में देखना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें मिलजुलकर भूख और कुपोषण की विकराल समस्याओं से निजात पाना होगा, वरना वक्त बिता चला जाएगा और बदहाली बदस्तूर कायम रहेगी। 

प्रधानमंत्री का मानना है कि पुराने रास्तों पर चलते हुए आप कभी भी नई मंजिलें तय नहीं कर सकते इसलिए वर्तमान सरकार नए एप्रोच के साथ काम कर रही है। सरकार का दर्शन है ‘सबका साथ, सबका विकास, सबमें विश्वास’ इसके जरिए प्रयास है कि समाज के इस अंतिम व्यक्ति तक वह हर सुविधा पहुंचाई जाए जो आजादी के 75 साल होने पर भी ठीक से नहीं पहुंच पाई है। 

हर हाथ को काम तथा हर पेट को भोजन मुहैया कराने की गरज से सरकार ने वित्तीय समावेशीकरण की प्रक्रिया चालू की है। जनधन खाते खोले गए लोगों को सीधे अकाउंट में पैसा भेजा गया मुद्रा योजना के तहत लाखों लोगों को ऋण देकर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया मेक इन इंडिया स्टार्ट अप स्टैंड अप स्वच्छता उद्यमी योजना से लेकर वह कल फलों कल तक का अभियान चलाया गया है। ईज आफ लिविंग की तरह ईज आफ डूइंग बिजनेस का माहौल बनाकर समतामूलक समाज की कल्पना की गई है। एक बेहतर उधमिता का वातावरण तैयार किया जा रहा है जिसमें लोग खुद तो काम शुरू करें ही समाज के दूसरे लोगों को भी काम से जोड़ सकें। 

2030 सतत विकास एजेंडा के लक्ष्य 2 का उद्देश्य अगले 15 वर्ष में भूख और हर तरह के कुपोषण को मिटाना और खेती की उत्पादकता को बढ़ाना है। सबके लिए पौष्टिक आहार सुलभ कराना चुनौतीपूर्ण है। हम अपना आहार कैसे उगाते हैं और कैसे खाते हैं इन सबका भूख के स्तर पर गहरा असर पड़ता है। खेती दुनिया में रोजगार देने वाला अकेला सबसे बड़ा क्षेत्र है। दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी वहीं भारत में कुल श्रमशक्ति के लगभग 55 प्रतिशत हिस्से को खेती में रोजगार मिलता है। देश की आधी से अधिक आबादी को रोजगार देने के बावजूद भारत के जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान मात्र 15 प्रतिशत है। भारत सरकार ने सिंचाई फसल बीमा और बेहतर किस्मों के मामले में कदम उठाकर खेती को मजबूत करने को प्राथमिकता दी है। सरकार ने खाद्य सुरक्षा बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं जिनमें राष्ट्रव्यापी लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली, राष्ट्रीय पोषाहार मिशन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून शामिल है। 

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना टिकाऊ खेती के बारे में राष्ट्रीय मिशन और बागवानी कृषि टेक्नोलॉजी तथा मवेशियों के बारे में अनेक योजनाएं भारत में खेती की स्थिति सुधारने में अग्रणी भूमिका निभा रही है। वर्ष 2030 तक भुखमरी मिटाना और सभी लोगों विशेषकर गरीब और लाचारी की स्थिति में जी रहे लोगों को भोजन सुलभ कराना कुपोषण के हर रूप को मिटाना जिसमें 5 वर्ष से छोटे बच्चों में बौनेपन पर और क्षीणता के बारे में भी अंतर्राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करना शामिल है। खेती की उत्पादकता खासकर महिलाओं, मूल निवासियों, पारिवारिक किसानों, चरवाहों और मछुआरों सहित लघु आहार उत्पादकों की आमदनी बढ़ाने  के साथ-साथ बाजार तक पक्की पहुंच कच्चे माल की जानकारी वित्तीय सेवाएं बाजार और मूल्य संवर्धन के लिए अवसर तथा गैर कृषि रोजगार सुलभ कराने के लिए प्रयास किया जाना है। ग्रामीण बुनियादी ढांचागत सुविधाओं कृषि अनुसंधान और विस्तार सेवाओं टेक्नोलॉजी विकास और पौधे एवं महेशी मवेशी जिन बैंकों में निवेश बढ़ाना प्राथमिकता में शामिल है।            

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भारतीय अर्थव्यवस्था में गुणात्मक सुधार

बदलते परिदृश्य में भारत अपनी विकासोन्मुख नीतियों, योजनाओं जैसे कि प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा, बुनियादी ढांचे के विकास में खर्च में वृद्धि, अर्थव्यवस्था का डिजिटलीकरण, भू राजनीतिक परिवर्तनों और व्यापार संबंधों के सकारात्मक प्रभाव के साथ लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में सतत प्रयत्नशील है। — शिवनंदन लाल

 

महंगाई के मोर्चे पर थोड़ी ही सही मगर राहत मिली है, वही पीएचडीसीसीआई की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया की शीर्ष 10 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में इकलौता है जिसने अपनी अर्थव्यवस्था में लगातार सुधार दर्ज किया है। भारत की वर्ष 2021 में वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सेदारी 7 प्रतिशत के करीब थी, जिसके अगले 5 वर्षों में 8.5 प्रतिशत से अधिक बढ़ने का अनुमान है। 90 के दशक में शुरू हुए आर्थिक सुधारों के बाद भारत की अर्थव्यवस्था की वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ने लगी और भारत आज वैश्विक व्यापार में प्रमुख हिस्सेदार बन गया है। फलस्वरूप बेसिक वस्तुओं के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी, जो 2000 में मात्र 0.6 प्रतिशत थी, अब बढ़कर 2020 में लगभग 1.9 प्रतिशत हो गई है। इसी अवधि के दौरान सर्विस निर्यात का प्रदर्शन और भी अधिक प्रभावशाली हुआ है और भारत में वैश्विक सर्विस निर्यात में लगभग 4 प्रतिशत का योगदान दिया है। भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था में भी बाहरी क्षेत्र का योगदान बढ़ने लगा है। भारतीय अर्थव्यवस्था का बढ़ता वैश्वीकरण अर्थव्यवस्था के वैश्विक व्यापार के लिए खुलने के प्रमुख मानक आयात और निर्यात की जीडीपी में हिस्सेदारी में भी प्रतिबिंबित हो रहा है। वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात और निर्यात का शेयर जीडीपी में 2007-08 में 41 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 60 प्रतिशत हो गया है। भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़ती बाहरी क्षेत्र की भूमिका को 2015 से 2019 के दौरान थोड़ा ब्रेक लगा था, जिसका मुख्य कारण बाहरी एवं घरेलू दोनों ही थे। बाहरी कारणों में विश्व की अर्थव्यवस्था में सुस्ती, वैश्विक मांग प्रमुख थे। घरेलू कारणों में भारत सरकार द्वारा 2016 में विमुद्रीकरण, नोटबंदी और 2017 में जीएसटी के शुभारंभ से आपूर्ति श्रृंखलाओं में अल्पकालिक व्यवधान और भारतीय रुपए की डॉलर के मुकाबले थोड़ी कमजोरी प्रमुख थे। इन अल्पकालिक बाधाओं के बावजूद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले वर्षों में बाहरी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने में भारत की भूमिका प्रमुख रहेगी।

2020 की शुरुआत में कोरोना महामारी के आगमन से और परिणामी राष्ट्रीय लॉकडाउन, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर प्रतिबंधों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान से अंतरराष्ट्रीय व्यापार की मात्रा में दुनिया की तर्ज पर भारत में भी भारी गिरावट दर्ज की गई थी। तत्कालीन आंकड़ों के अनुसार इस गिरावट की दर 13 से लेकर 23 प्रतिशत तक की सीमा में आंकी गई थी। हालांकि यह प्रभाव ज्यादा देर तक स्थाई नहीं रह सका और परिणाम पलटते हुए दिखे। भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार ने तेजी से गति पकड़ी और जल्दी ही रिकवरी दर्ज हुई और व्यापार की मात्रा 2021 में महामारी के पहले के स्तर पर पहुंच गई। आंकड़ों के अनुसार सर्विसेज के व्यापार में वस्तुओं के व्यापार की तुलना में काफी अधिक गिरावट आई थी, पर इसमें सुधार की दर भी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। भारत के सर्विसेज निर्यात में 2020 की पहली तिमाही में 22 प्रतिशत की गिरावट आई थी। 

महामारी से प्रेरित वैश्विक उथल-पुथल ने कुछ नए अवसरों को भी जन्म दिया और इन अवसरों के कारण व्यापार के वैश्वीकरण की गति में तेजी आई। स्थापित सिद्धांत यह बताता है कि वैश्वीकरण का नया रूप मुख्य रूप से सेवाओं के संचालन के तरीके को बदलकर सेवा क्षेत्र को प्रभावित करता है। इस परिवर्तन से डिजिटली इनेबल्ड सर्विसेज सेक्टर जैसे कि फिटनेस, ई-कॉमर्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्रिप्टो करेंसी, दिल्ली हेल्थ, ऑनलाइन शिक्षा जैसे नए क्षेत्र में नए अवसर पैदा हुए हैं। भारत ने अपने इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के बड़े पुल के बल पर डिजिटल टेक्नोलॉजी की नई दुनिया को न केवल अपनाया है बल्कि इसमें मजबूत उपस्थिति भी दर्ज कराई है। अब ताजा रिपोर्ट यह भी बता रही है कि दुनिया के कई विकसित देश भारत के इस मॉडल की ओर देख रहे हैं।

पिछले कुछ सालों के दौरान भारत के व्यापारिक भागीदारों की हिस्सेदारी में भी महत्वपूर्ण बदलाव आया है। पश्चिम के देशों के साथ व्यापार में वृद्धि के साथ-साथ भारत के निर्यात में एशिया का हिस्सा धीरे धीरे कम हो रहा है। भारत पश्चिमी देशों के साथ नए क्षेत्रों में व्यापार संबंध स्थापित करने की तलाश में है, क्योंकि आसियान क्षेत्र में भारत का निर्यात गैर टैरिफ बाधाओं को कम करने के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में लगभग स्थिरता हो गया है। इसका मुख्य कारण यह है कि श्रम प्रधान उत्पादों के साथ भारत के निर्यात का सामान अन्य आसियान देशों से बहुत अलग नहीं है। भारत ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कुछ देशों के साथ वैकल्पिक व्यापारिक भागीदार के रूप में आगे बढ़ रहा है। उल्लेखनीय है कि कुछ पश्चिमी देशों के चीन के साथ संबंध हाल के वर्षों में अपेक्षाकृत खराब हुए हैं। इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए भारत ने कुछ देशों के साथ टैरिफ मुक्त व्यापार समझौतों की पहल में आगे बढ़ा है। कई एक खाड़ी देशों के साथ भी इस तरह की व्यापारिक बातचीत चल रही है।

महामारी ने भारत के फार्मा उद्योग के लिए भी अवसर खोले हैं। भारत का फार्मा निर्यात उसके कुल निर्यात का 6.6 प्रतिशत है और भारत की जीडीपी में इसका लगभग 2 प्रतिशत का योगदान है। भारत दुनिया में चिकित्सा वस्तुओं का 12वां सबसे बड़ा निर्यातक देश है और पिछले दो दशकों के दौरान भारत का फार्मा निर्यात गुड्स निर्यात की तुलना में कुछ ज्यादा ही तेजी से आगे बढ़ा है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार भविष्य में घरेलू फार्मा उद्योग के विकास को बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी है, शोध पर खर्च में वृद्धि और एक्टिव फार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट के आयात पर निर्भरता को कम करना। सरकार ने इस दिशा में भी कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं ताकि कुछ प्रमुख ड्रग इंटरमीडिएट सप्लाई के लिए आयात पर निर्भरता को कम किया जा सके।

बदलते परिदृश्य में भारत अपनी विकासोन्मुख नीतियों, योजनाओं जैसे कि प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा, बुनियादी ढांचे के विकास में खर्च में वृद्धि, अर्थव्यवस्था का डिजिटलीकरण, भू राजनीतिक परिवर्तनों और व्यापार संबंधों के सकारात्मक प्रभाव के साथ लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में सतत प्रयत्नशील है। इसके लिए निर्यात की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं में विविधता लाकर वैश्विक बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी ध्यान देना जरूरी है।    

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पर्यटन से लगेंगे रोजगार को पंख

सरकार को विश्व भर में भारतीय संस्कृति विचारधारा चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ अचंभित करने वाली भौगोलिक बनावट देश की सुंदरता को प्रमुखता से फैलाने का प्रयास करना चाहिए। — शिवनंदन लाल

 

सेहतमंद पर्यटन मुहैया कराने की दृष्टि से दुनिया में भारत को अव्वल स्थान प्राप्त है। भारत जैसे विरासत के धनी राष्ट्र के लिए यहां के पुरातात्विक धरोहर केवल दार्शनिक स्थल भर नहीं है, बल्कि राजस्व प्राप्ति का स्रोत तथा अनेक लोगों को रोजगार मुहैया कराने का माध्यम भी है।

27 सितंबर को हर साल विश्व पर्यटन दिवस के रूप में मनाया जाता है। हाल ही में केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय द्वारा राज्य के पर्यटन मंत्रियों के साथ एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान पर्यटन को बढ़ाने के लिए व्यापक विचार-विमर्श किया गया। इस सम्मेलन में 19 राज्यों के पर्यटन मंत्रियों, पर्यटन सचिवों और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया तथा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न मुद्दों पर विचार विमर्श किया। देश के प्राकृतिक, ऐतिहासिक, पौराणिक, भौगोलिक विविधता वाले प्रदेशों ने पर्यटन के जरिए देश की अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए रणनीति तैयार की है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत आज विभिन्न श्रेणी के पर्यटन के लिए दुनिया में आकर्षण का केंद्र बन गया है। चिकित्सा, पर्यटन, साहसिक पर्यटन, ग्रामीण पर्यटन और पारिस्थितिकी पर्यटन के लिए यात्री सहज भाव से भारत को वरीयता दे रहे हैं। भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी तक और अरुणाचल से गुजरात तक के प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्टता और संस्कृति है। यह क्षेत्र अपनी भौगोलिक बनावट, जिसमें ठंडा, गर्म, रेगिस्तान, गंगा, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां विशाल वन क्षेत्र, अंडमान निकोबार जैसे दीप समूह, विभिन्न पर्वत और पठार पर्यटकों को बरबस ललचाते हैं। धार्मिक रूप से समृद्ध होने के कारण भी बड़ी संख्या में दक्षिण पूर्व और पूर्वी एशिया के लोग यहां आते रहे हैं।

वर्ल्ड ट्रैवल एंड टूरिज्म काउंसिल की रिपोर्ट में भारत को पर्यटन के मामले में तीसरा स्थान हासिल है। इस रिपोर्ट में 185 देशों के पिछले 7 वर्षों का प्रदर्शन सकल घरेलू उत्पाद में कुल योगदान अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन खर्च, घरेलू पर्यटन खर्च एवं पूंजी निवेश के मांगों को आधार बनाकर निष्कर्ष निकाला गया है। महामारी से पहले भारत प्रतिवर्ष लगभग 25 अरब डालर का राजस्व अर्जित करता रहा, जिसे 2025 तक 120 अरब डालर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। यह फ्रांस और स्पेन जैसे देशों की तुलना में बहुत अधिक है।

केंद्र की सरकार समावेशी विकास के लिए पर्यटन को उर्वर क्षेत्र मानकर अपनी नीतियां विकसित की हैं। केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय इसे आगे बढ़ाने में जुटा हुआ है। हाल ही में डेनमार्क के दौरे पर गए प्रधानमंत्री ने वहां के सभी भारतीय लोगों से पांच गैर भारतीय लोगों को भारत आने के लिए प्रेरित करने का आह्वान किया है। ‘चलो इंडिया’ का नारा देते हुए उन्होंने कहा कि सभी भारतीय राष्ट्रदूत अगर इस काम में लग जाए तो बाहर के लोगों को भारत को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी। हालांकि भारत में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पहले से ही मुकम्मल तैयारियां की गई है। पर्यटन और संस्कृति मंत्रालयों के लिए बजट आवंटन भी लगातार बढ़ता रहा है। बीच में कोरोना महामारी के दौरान बहुत से उतार चढ़ाव आए, पर्यटन की रफ्तार थम सी गई थी। लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार भी हुए, पर अनलॉक के बाद पर्यटन ने फिर से गति पकड़ ली है। वित्त वर्ष 2020 में भारत में 39 मिलियन नौकरियां पर्यटन पर आधारित थी, जो देश में कुल रोजगार का लगभग 8 प्रतिशत था। 2029 तक इसके 53 मिलियन तक होने की उम्मीद है। वर्ष 2021 में भारत में कुल 856337 पर्यटक भारत भ्रमण के लिए आए थे। 

कोविड के बाद केंद्र सरकार ने विभिन्न पहलुओं के माध्यम से घरेलू पर्यटन को भी गति देने का प्रयास किया है। केंद्र सरकार ने ‘देखां अपना देश’ की शुरुआत की है, जिसके तहत विभिन्न प्रचार, गतिविधियों जैसे वेबीनार, ऑनलाइन प्रतिज्ञा, प्रश्नोत्तरी से कार्यक्रमों के जरिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है ताकि घरेलू पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जा सके। भारत एक साल के लिए जी-20 की अध्यक्षता करने जा रहा है। अध्यक्षता का यह समय आगामी 1 दिसंबर 2022 से 30 नवंबर 2023 तक चलेगा। इस दौरान देश के लगभग 55 शहरों में जी-20 से जुड़ी लगभग 215 बैठकें और अन्य आयोजन प्रस्तावित हैं। सरकार भारत को मिली इस अध्यक्षता को विदेशी पर्यटन के लिहाज से बेहतर मौके की तरह देख रही है। केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय का मानना है कि भारतीय पर्यटन को विश्व मंच पर पेश करने का यह सुनहरा मौका है। केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों से भी कहा है कि वे अपने यहां के पर्यटन उत्पादों और डेस्टिनेशंस को इस तरह तैयार करें कि यहां आने वाले मेहमान उनसे प्रभावित और आकर्षित हो। अध्यक्षता के बहाने मिले मौके पर सरकार अपने देश की ऐसी पारंपरिक चीजों के पहलुओं को दिखाना चाहती है जो अपने आपमें अनूठी हो। मालूम हो कि जी-20 से जुड़े आयोजनों में चार आयोजन पूरी तरह से पर्यटन आधारित होंगे। यह चारों कार्यक्रम गुजरात के कच्छ, पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी, जम्मू कश्मीर और गोवा में किए जाएंगे। सरकार ने तय किया है कि इन सभी पर्यटक स्थलों पर प्रमुखता से भारत की आन, बान, शान तिरंगा को भी लहराया जाएगा।

वैश्विक स्तर पर पर्यटन एक बड़ा उद्योग है। यह कई क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित करता है तथा अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में मदद करता है। आंकड़े की बात करें तो पर्यटन क्षेत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर लगभग 5 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। सरकार की तरफ से जारी एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 के दौरान भारत को ट्रैवल एंड टूरिज्म क्षेत्र में 10 लाख नई नौकरियां मिलने का अनुमान है। पर्यटन उद्योग में निरंतर आ रहे उछाल से इस क्षेत्र में प्रगति है। पर्यटन से भारत में महिलाओं के लिए भी रोजगार के अवसरों की खिड़की खुली है। वैश्विक स्तर पर भारत में अन्य क्षेत्रों के मुकाबले पर्यटन क्षेत्र में दोगुना से अधिक महिलाएं कार्यरत है। इस दृष्टि से पर्यटन क्षेत्र महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ समानता और सामाजिक न्याय का भी माध्यम बना है। आज भारत का प्रयोग अपने पारंपरिक डायरो से निकलकर चिकित्सा और योगा जैसे क्षेत्रों में फैल रहा है, इसलिए यहां अवसर भी बढ़ रहे हैं। 

सरकार ने इसे और अधिक गति देने की गरज से पर्यटन सर्किट के विकास से स्वदेश दर्शन योजना, विरासत स्थलों के विकास हेतु हृदय योजना तथा धार्मिक स्थलों के लिए प्रसाद योजना शुरू की है। पर्यटन स्थलों पर रोपवे के निर्माण तथा रेलवे स्टेशनों लॉजिस्टिक पार्क के आसपास विकास की गति तेज कर दी है। विदेशी पर्यटकों के आगमन को सरल बनाने के लिए 166 देशों के लिए वीजा की शुरुआत हुई है। आगे इसके शुल्क में कमी लाने का भी प्रस्ताव है। अपनी विरासत के प्रति लगाव विस्तृत करने के लिए ‘धरोहर गोद लो योजना’ तथा विदेशों में भारतीय धरोहरों को लोकप्रिय बनाने के लिए ‘देखो अपना देश’ नाम से पर्यटन पर्व का अनुष्ठान तथा राज्यों के विशेष स्थलों में पर्यटन समारोह पर्यटन सभी के लिए का आयोजन किया जा रहा है। सरकार ने अतुल्य भारत का नया पोर्टल लांच कर सभी आवश्यक जानकारियों को सुलभ कराया है। मध्य प्रदेश के सांची स्तूप, उत्तर प्रदेश के सारनाथ और बिहार के बोध गया जैसे स्थलों पर बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। रात्रि कालीन पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए संस्कृति मंत्रालय ने देश के 10 ऐतिहासिक स्मारकों को आगंतुकों के लिए रात में 9ः00 बजे तक खुला रखने का निर्णय लिया है। वहीं गृह मंत्रालय में 137 चोटियों को विदेशी पर्यटकों के लिए खोलने का निर्णय किया है। 

भारत सरकार द्वारा पर्यटकों की सुविधा के लिए किए जा रहे प्रयासों के बावजूद पर्यटन प्रणाली के समक्ष कई चुनौतियां अभी नहीं बनी हुई है। वैश्विक मानकों के अनुसार बुनियादी ढांचा का अभाव पर्यटन के राह में बड़ा रोड़ा है। कम बजट आवंटन के कारण आर्थिक व सामाजिक और संरचना की रफ्तार भी धीरे है। सफल स्वच्छ भारत अभियान के बाद भी देश में यत्र-तत्र फैली गंदगी से पार पाना अभी भी बाकी है। सुरक्षा सर्वेक्षण में भी भारत का स्थान दुनिया के मानकों पर बहुत नीचे है। स्वास्थ, योगा, प्राकृतिक चिकित्सा, साहसिक पर्यटन में अपार संभावना है, पर इसमें सरकार अभी अपेक्षित निवेश नहीं कर पा रही है। 

ऐसे में ‘अतुल्य भारत’ और ‘अतिथि देवो भव’ की उदास भावना के साथ अधिक से अधिक पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए एडवेंचर टूरिज्म को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उड़ान योजना का विस्तार हो तथा सभी राज्यों को पुरातत्व सर्वेक्षण की सहायता से अपने धरोहर स्थलों के लिए यूनेस्को के मानकों को ध्यान में रखकर प्रस्ताव तैयार करना चाहिए। सरकार को विश्व भर में भारतीय संस्कृति विचारधारा चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ अचंभित करने वाली भौगोलिक बनावट देश की सुंदरता को प्रमुखता से फैलाने का प्रयास करना चाहिए। 

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प्रधानमंत्री आवास योजनाः ग्रामीण व शहरी सभी के लिए आवास

प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ष 2022 तक 2 करोड़ 95 लाख घर बनाने का लक्ष्य रखा गया था। अब तक लगभग 2 करोड घरों का निर्माण कर दिया गया। — शिवनंदन लाल

 

सरकार गरीब कल्याण के लिए ढेर सारी योजनाएं चला रही है, जिसमें आवास योजना भी शामिल है। प्रधानमंत्री आवास योजना को वर्ष 2015 में शुरू किया गया था इसका उद्देश्य वर्ष 2022 तक देश के हर परिवार को ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्र में आवास देना है ताकि सब के पास रहने के लिए एक अदद पक्का घर हो जाए। लेकिन अब सरकार ने इसकी अवधि वर्ष 2024 तक बढ़ा दी है।

प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में वर्ष 2022 तक 2 करोड़ 95 लाख घर बनाने का लक्ष्य रखा गया था। अब तक लगभग 2 करोड घरों का निर्माण कर दिया गया। चूंकि कोरोना महामारी के कारण देश दुनिया के कामों में बाधा पहुंची थी उसका सीधा असर इस योजना पर भी पड़ा है। 95 लाख घर बनने अभी बाकी है, लिहाजा सरकार ने आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए इस योजना की अवधि को बढ़ा दिया है जिससे कि वर्ष 2024 तक हर गरीब को एक पक्का मकान मिल सके।

प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग लोगों को घर मुहैया कराया जाता है। योजना के अंतर्गत सरकार लोगों को घर बनवाने के लिए लोन पर सब्सिडी की सुविधा देती है। छोटी दीपावली यानि धनतेरस के मौके पर प्रधानमंत्री ने हाल ही में लाखों हितग्राहियों को डिजिटल माध्यम से गृह प्रवेश कराया था। आवास आवंटन के मामले में देश में उत्तर प्रदेश बड़ा राज्य होने के नाते सबसे आगे है। इसके बाद मध्य प्रदेश और तमिलनाडु क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर है।

भारत सरकार द्वारा राज्य केंद्र शासित प्रदेशों केंद्रीय नोडल एजेंसियों के माध्यम से देश के शहरी क्षेत्रों में सभी पात्र लाभार्थियों को पक्के मकान उपलब्ध कराने के लिए क्रियान्वित की गई है। यह योजना देश के संपूर्ण शहरी क्षेत्रों अर्थात वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार सभी सांविधिक कस्बों और अधिसूचित नियोजित विकास क्षेत्रों को कवर करती है। इस योजना को चार कार्य क्षेत्रों के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है - 1. लाभार्थी के नेतृत्व में निर्माण संवर्धन (बीएलसी), 2. साझेदारी में किफायती आवास (एएचपी), 3. इन सीटू स्लम पुनर्विकास (आईएसएसआर), 4. क्रेडिट लिंक्ड सब्सिडी स्कीम (सीएलएसएस)। इस योजना के लिए भारत सरकार वित्तीय सहायता प्रदान करती है वहीं राज्य सरकार केंद्र शासित प्रदेश लाभार्थियों के चयन सहित योजना को लागू करने में अहम भूमिका अदा करते हैं।

वर्ष 2004 से 2014 के दौरान शहरी आवास योजना के अंतर्गत 8 लाख 4 हजार आवासों का निर्माण पूरा किया गया था। मोदी सरकार के कार्यकाल में सभी पात्र शहरी निवासियों को अधिक से अधिक संख्या में आवास उपलब्ध कराने के मुद्दे पर फोकस किया गया और पीएमएवाई शहरी योजना की परिकल्पना की गई। वर्ष 2017 में मूल अनुमानित मांग 100 लाख आवासों की थी। इस मूल अनुमानित मांग के मुकाबले 102 लाख मकानों का शिलान्यास कर निर्माणाधीन बना दिया गया है। इनमें से 62 लाख आवासों का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। कुल स्वीकृत 123 लाख मकानों में से 40 लाख आवासों के प्रस्ताव राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से देर से यानी योजना के अंतिम वर्षों के दौरान प्राप्त हुए थे जिन्हें पूरा करने के लिए अतिरिक्त और 2 वर्ष की जरूरत है। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल की समिति ने इसकी अवधि 2022 से बढ़ाकर 31 दिसंबर 2024 कर दिया है।

मालूम हो कि 2004 से 2014 के बीच आवास योजना के लिए जारी किए गए 20 हजार करोड की कुल राशि के मुकाबले वर्ष 2015 से लेकर अब तक 2 लाख 10 हजार करोड रुपए स्वीकृत हुए हैं। 31 मार्च 2022 तक 1 लाख 18 हजार 20 करोड रुपए की केंद्रीय सहायता राशि जारी हो चुकी है और इस निमित्त 30 दिसंबर 2024 तक 85 हजार 406 करोड रुपए केंद्रीय सहायता सब्सिडी के रूप में जारी किए जाएंगे ।

इसी तर्ज पर प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के लिए प्रस्तावित योजना का तीन चौथाई से अधिक का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है। सरकार को भरोसा है कि स्थाई प्रतीक्षा सूची में शामिल सभी आवासों का लक्ष्य अमृत महोत्सव के अंत तक पूरे हो जाएंगे। वर्ष 2011 के डेटाबेस का उपयोग करके पहचान की गई मौजूदा स्थाई प्रतीक्षा सूची के हिसाब से अब तक सवा दो करोड़ लाभार्थी पात्र पाए गए हैं। हालांकि इस सूची में शुरू में 2 करोड़ 95 लाख परिवार शामिल थे किंतु मंजूरी के समय सत्यापन सहित कई स्तरों पर की गई जांच में बहुत सारे घरों को पात्र नहीं पाया गया। इसलिए इस सूची को सीमित कर दिया गया आगे इसमें और कमी होने की संभावना है। इसे देखते हुए लगभग 2 करोड मकानों को मंजूरी दी गई है और मंजूरी पाने वाले मकानों में तीन चौथाई का काम पूरा हो चुका है।

वित्तीय वर्ष 2020-21 में बजटीय सहायता के रूप में कुल 19 हजार 269 करोड रुपए का आवंटन उपलब्ध कराया गया था। इसके अलावा 20 हजार करोड रूपए की अतिरिक्त बजटीय सहायता प्रदान की गई। कुल मिलाकर 39 हजार 269 करोड रुपए की राशि जारी की गई जो योजना शुरू होने के बाद किसी भी वर्ष में जारी की गई सबसे अधिक राशि है। राज्यों की हिस्सेदारी सहित राज्य द्वारा किए गए वह में मौजूदा वित्त वर्ष में 46 हजार 661 करोड़ की अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2014-15 से आवास कार्यों की गति में तेजी आई है जिसमें पूर्ववर्त्ती इंदिरा आवास योजना भी शामिल है। सुधारों पर जोर देने के कारण इंदिरा आवास योजना में भी 73 लाख घरों का निर्माण पूरा हुआ है।

कुछ कार्यान्वयन सुधारों के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत सरकार ने मकानों के निर्माण की गति और गुणवत्ता में सुधार करने, लाभार्थियों को समय पर सहायता राशि जारी करने, लाभार्थियों के खाते में धन का प्रत्यक्ष हस्तांतरण, लाभार्थियों के लिए तकनीकी सहायता सुनिश्चित करने और एमआईएस आवास सॉफ्ट तथा आवास ऐप के माध्यम से कड़ी निगरानी रखने का लक्ष्य रखा है।

इस बीच पात्र परिवारों की पहचान के लिए फील्ड अधिकारियों की मदद से सभी राज्यों केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा आवास प्लस नाम का एक सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षण में पता चला है कि कई लोगों को पात्र होने के बावजूद स्थाई प्रतीक्षा सूची में शामिल नहीं किया गया है। वित्त मंत्रालय ने ऐसे पात्र परिवारों को शामिल किए जाने पर सहमति दी है। बताते हैं कि सर्वेक्षण नतीजे की समीक्षा की जा रही है और इसके बाद इसका कार्यान्वयन किया जाएगा।

आजादी के अमृत काल में सभी के लिए आवास के सपने को साकार करने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय ग्रामीण विकास व शहरी कार्य मंत्रालय की हालिया बैठक में किफायती आवास के लिए सबको शामिल करने की सुविधा, किफायती आवास की सुपुर्दगी बढ़ाने के लिए अन्य योजनाओं शहरी नियोजन और बुनियादी ढांचे की रणनीतियों के साथ तालमेल तथा किफायती आवास क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया।

वर्ष 2022-23 का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने शहरी आवास के महत्व को रेखांकित किया था तथा कहा कि भारत 2022 से 2047 तक अगले 25 वर्षों के अमृत काल के दौरान अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए जो कार्य नीति तैयार की है उनमें सबके लिए घर को प्राथमिकता दी गई है। पीएम आवास योजना के तहत चिन्हित पात्र लाभार्थियों ग्रामीण और शहरी दोनों के लिए 80 लाख घरों का लक्ष्य पूरा करने के लिए 48 हजार करोड की राशि आवंटित की गई है इसमें 28 हजार करोड़ का प्रावधान शहरी क्षेत्र के लिए है। यह वित्तीय प्रतिबद्धता न केवल आश्रय प्रदान करेगी बल्कि 80 लाख लाभार्थी परिवारों के जीवन में सम्मान भी जोड़ेगी। इससे देश के लगभग 4 करोड़ नागरिकों को प्रत्यक्ष लाभ होगा। वर्ष 2022 देश में बनने वाले इन 80 लाख घरों में 28 लाख घर शहरी इलाकों में तथा 52 लाख घर ग्रामीण क्षेत्रों में बनेंगे।

जहां तक इस योजना के तहत लाभ प्राप्त करने की बात है तो सबसे पहले पीएमएवाई की अधिकारिक वेबसाइट चउंलउपेण्हवअण्पद पर लॉग इन कर एलआईजी, एमआईजी, ईडब्ल्यूएस या स्लमवासियों के तहत विकल्प चुनना होता है। इसके बाद आधार नंबर दर्ज कर उसका विवरण स्थापित सत्यापित करना होता है। सभी विवरण देने के बाद कैप्चा कोड डालकर सबमिट कर देने से आवेदन की प्रक्रिया पूरी हो जाती है।

3 लाख से 18 लाख रुपए तक की वार्षिक आय वाला कोई भी परिवार इसके लिए आवेदन कर सकता है। आवेदक या आवेदक के परिवार के पास देश के किसी भी हिस्से में पक्का घर नहीं होना चाहिए।          

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मई दिवस/मजदूर दिवस: जस की तस है कामगारों की दशा

मजदूरों के लिए लोकतंत्र का राज और आजादी का अमृत महोत्सव होने का कोई मतलब नहीं है। वह आज भी उतने ही शोषित हैं जितना पहले के दौर में थे। आजादी के अमृत काल के दौरान केंद्र की सरकार द्वारा 80 करोड़ को लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराना इस बात की तस्दीक करता है। - शिवनंदन लाल

 

सन् 1886 में मजदूरों ने पहली दफा शिकागो शहर में रैली निकाली थी तो उनकी एक ही मांग थी कि हमारे काम के घंटे आठ होने चाहिए। तब पुलिस ने उनके ऊपर गोलियां चलाई, जिससे कई मजदूर शहीद हुए। अंततः उनकी बात मान ली गई। काम के घंटे आठ किए गए। उसी की याद में हम ’मई दिवस’ मनाते रहे हैं। बीते 137 सालों में दुनिया के साथ भारत में भी संगठित क्षेत्र के मजदूरों की सेवा शर्तों में काफी हद तक सुधार हुआ है, इससे मजदूरों की दशा-दिशा बदली है, बावजूद देश में मजदूरों के बड़े क्षेत्र असंगठित वर्ग के कामगारों की स्थिति निरंतर और अधिक बदतर और श्रम-साध्य होती गई है। सुधार की अनेक घोषणाओं के बावजूद असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को प्रतिदिन 12 से लेकर 16 घंटे तक काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। करोना कॉल के बाद इस तरह के व्यवहार में और वृद्धि हुई है।

हाल के वर्षों में देश की संसद ने तीन प्रमुख प्रमुख श्रम सुधार विधेयक इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड 2020, आक्यूपेशनल सेफ्टी हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड 2020 और कोड आन सोशल सिक्योरिटी 2020 पारित कर कानून बनाया। कोविड-19 की चुनौतियों और भारत के लिए वैश्विक उद्योग कारोबार के बढ़ते मौकों को ध्यान में रखते हुए नए श्रम कानून को नियोक्ता, कर्मचारी तथा सरकार तीनों के लिए फायदेमंद माना गया। कहा गया कि इन कानूनों से श्रमिकों को बहुत सहूलियतें प्राप्त होंगी। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए अलग से फंड तैयार किया जाएगा। खतरनाक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों को अनिवार्य रूप से कर्मचारी राज्य बीमा निगम की सुविधा दी जाएगी। सेल्फ एसेसमेंट के आधार पर श्रमिक अपना पंजीयन करा सकेंगे। घर से काम पर आने जाने के दौरान दुर्घटना होने पर कर्मचारी हर्जाना पाने का हकदार होगा। महिला श्रमिक अपनी इच्छा से रात की पाली में भी काम कर सकेंगे। सभी कामगारों को नियुक्ति पत्र दिया जाएगा तथा इनका हिसाब किताब रखने के लिए अलग से एक लेबर ब्यूरो बनाया जाएगा। उद्यमियों के लिए भी कई फायदे गिनाए गए। मसलन इंस्पेक्टर राज से मुक्ति दिलाने के साथ-साथ श्रम संहिताओं के तहत नियमों का अनुपालन नहीं करने को लेकर अधिकतम सजा सात साल को घटाकर तीन साल कर दिया गया।विभिन्न राज्य सरकारों के द्वारा कारखाने का लाइसेंस लेने की शर्तों में भी ढील दी गई। कारखाना अधिनियम 1948 और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अधिकांश प्रावधान लागू किए जाने में अत्यधिक रियायतें दी गई। उत्पादन बढ़ाने के लिए राज्यों ने उत्पादन इकाइयों में काम के घंटों को 8 से बढ़ाकर 12 कर दिया।

यानि मजदूर जहां से चले थे, कमोबेश फिर से वही आकर के खड़े हो गए हैं। शिकागो में जो सफलता मिली थी वह 137 साल के अंतराल पर फिर अपने पुराने मुकाम के करीब पहुंच गई। मजदूर एक बार फिर 12 से 16 घंटे काम करने जैसी गुलामी की स्थिति में फंस गया है। आज पूंजी की दुनिया ने पूरे विश्व को बाजार में बदल दिया है। हर चीज बिकने के लिए तैयार है। परंतु इसकी कीमत पूंजी के मालिक ही तय करेंगे। यहां तक कि भारत के किसान अपने खेतों में जो अन्य पैदा करेंगे वह भी किस भाव पर बिकेगा, यह महाजन ही तय करेगा और यह हो भी रहा है। जिन किसानों की पहुंच मंडियों तक नहीं है, उनके उत्पाद महाजनों के रहमोकरम पर है।

सन 1940 में संयुक्त राष्ट्र की तरफ से मानव अधिकारों पर सार्वभौम घोषणा पत्र जारी किया गया था। भारत भी उसका एक सदस्य है, जिस पर यह घोषणा पत्र बाध्यकारी है, जिसमें लिखा गया है कि मजदूरी इतनी होनी चाहिए कि जिससे मजदूर और उसके परिवार का भरण पोषण हो सके। उसी साल हमारे यहां न्यूनतम मजदूरी कानून बनाया गया था। समय-समय पर न्यूनतम मजदूरी का पैमाना बदलता और बढ़ता रहा है। वर्तमान में देश में न्यूनतम मजदूरी 350 रू. से लेकर 523 रू. तक कौशल के हिसाब से 4 कोटियों में अनुमन्य है। लेकिन इस कानून में सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें परिवार शब्द गायब है। संविधान के अनुच्छेद 43 जहां मजदूरी की बात आती है वहां पर भी परिवार नहीं है। चूंकि परिवार शब्द नहीं है इसका परिणाम यह हुआ कि मजदूरों के लिए जो भी मजदूरी तय की जाएगी, उसे तय करने के और सारे कारक हो सकते हैं, पर इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाएगा कि एक मजदूर को कम से कम इतनी कमाई होनी चाहिए कि वह अपने परिवार का भरण पोषण कर सकें। आज देश में असंगठित क्षेत्र के लगभग 12 करोड़ परिवार है। इनमें से ज्यादातर गांव में है जो इस असमानता के खिलाफ बेबस और लाचार हैं। सरकार के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के आंकड़ों के अनुसार असंगठित क्षेत्र के हर परिवार के दो लोगों को काम करना पड़ता है। सरकार एक आदमी की मजदूरी इतनी भी तय करने के लिए तैयार नहीं है कि एक आदमी कमाए और पूरा परिवार खाए जो कि मानवाधिकार के तहत अनिवार्य है। इसका मतलब यह है कि व्यावहारिक रूप में दिन-ब-दिन मजदूरी बढ़ने की बजाय घटती जा रही है और असमानता बढ़ती जा रही है। हालांकि संगठित क्षेत्र में मजदूरों को ज्यादा मजदूरी मिलने लगी है। लेकिन वहां अस्थाई नौकरिया घटने लगी है अधिकांश सरकारी संस्थानों में भी संविदा के आधार पर ठेके के लोग रखे जाने लगे हैं। वहां स्थाई कामगारों की तुलना में ठेके के कार्मिकों को बहुत कम सुविधाएं उपलब्ध होती है।

असंगठित क्षेत्र की बात करते हुए वर्तमान में सबसे प्रमुख मानदंड मनरेगा को कहा जा सकता है जिसके तहत काम करने वाले को मजदूरी के रूप में विभिन्न राज्यों में 210 रू. से लेकर 228 रू. रोज प्राप्त होता है। अर्जुन सेन गुप्ता समिति ने अपनी रपट में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए 49 रू. प्रतिदिन मजदूरी की सिफारिश की थी। मनरेगा के कानून में 60 रू. प्रति कार्य दिवस लिखा गया। व्यवहार में 100 रू. से शुरू किया गया था जो अब अलग- अलग राज्यों में 210 रू. से लेकर 228 रू. तक पहुंचा है। इसे देखकर कई बार आशंका पनपती है की साजिश के तहत पूजी निवेश के लिए पूंजी जुटाने का ही खेल है क्या? क्योंकि पूजी कुल मिलाकर दो तरह से जुटाई जा सकती है या तो टैक्स लेकर या फिर लोगों की मेहनत का मोल कम करके। भारी भरकम तनख्वाह पाने वाले संगठित क्षेत्र के लोगों की अक्सर शिकायत रहती है कि उनकी पगार का बड़ा हिस्सा सरकार टैक्स के रूप में ले लेती है। वह कहते हैं अच्छा होता कि सरकार टैक्स काट कर के ही उनकी पगार देती। यहां एक सवाल विचारणीय हो सकता है कि सरकार मजदूरों को संतोषजनक मजदूरी अदा करे और बाद में उन पर थोड़ा बहुत टैक्स लगाकर उन्हें राहत दे सकती है क्या। भारत जन आंदोलन के अध्यक्ष रहे डॉ ब्रह्मदेव शर्मा ने इस पर काम किया था तथा उनका आकलन था कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का शोषण आम बात है। उन्होंने अपने अध्ययन में यह अनुमान लगाया था कि लगभग एक करोड़ रुपए, प्रति गांव, प्रतिवर्ष, मजदूरों से शोषण हो रहा है।

देश में आजादी का अमृत काल चल रहा है। पिछले 75 साल से देश का मजदूर काम कर रहा है। विकास के लिए पूंजी जुटाने के खेल में मजदूरों का शोषण हो रहा है जिसका सबसे ज्यादा शिकार असंगठित क्षेत्र के मजदूर हैं। इस शोषण के साथ-साथ विकास का जो हमारा पूंजीवादी ढांचा है, उसमें मजदूरों की जरूरत भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है। आज अधिकांश काम मशीन से किया जाने लगा है ऐसे में मजदूरों के लिए पारंपरिक कृषि क्षेत्र ही एकमात्र जगह बचती है जहां से वह आजीविका कमा सकता है। मगर इसमें भी साजिश है। अगर हम मनरेगा के तहत दी जा रही मजदूरी की तुलना करें तो किसान इस स्थिति में नहीं है कि वह उसके बराबर भी मजदूरी देकर अपने खेतों में काम करा सके। क्योंकि खेती से उसके पास इतनी बचत नहीं है कि वह दे सकें। यही कारण है कि अधिकांश किसान खेती से भी भागने लगे हैं।

देश के लगभग 40 करोड मजदूरों में 95 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र के हैं। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए न तो काम के घंटे निर्धारित है और ना ही कोई वेतन आयोग है। उनके लिए न तो काम की निश्चिता है और ना ही भविष्य निधि पेंशन की कोई व्यवस्था उनके लिए न कोई नियम कानून है नहीं सामाजिक सुरक्षा और नहीं काम करने का कोई सही माहौल। उनके हित के लिए बने किसी भी सरकारी कानून को ठीक से लागू नहीं किया जाता। मजदूर के खिलाफ समूचे देश में एक तरह से शोषण का साम्राज्य कायम है। उनके लिए लोकतंत्र का राज और आजादी का अमृत महोत्सव होने का कोई मतलब नहीं है। वह आज भी उतने ही शोषित हैं जितना पहले के दौर में थे। आजादी के अमृत काल के दौरान केंद्र की सरकार द्वारा 80 करोड़ को लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराना इस बात की तस्दीक करता है। 

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सरकारें पशुओं की भी सुधि ले

मनुष्य का जीवन सर्वोपरि है उसे उच्च प्राथमिकता के साथ डील किया जाना चाहिए लेकिन आपदाओं के वक्त पशुओं को बचाने के लिए भी किसी ठोस तंत्र की बात अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि भारत एक पशु प्रधान देश भी है। - शिवनंदन लाल

 

हर साल की तरह इस बार भी बाढ़ और भयंकर बारिश की शुरुआत असम से हुई और फिर कई प्रांतों में बाढ़ की विनाश लीला दिखने लगी। देश की राजधानी दिल्ली में तो 1978 के बाद यानी 48 सालों के बाद भयावह बाढ़ आई जिसने पूरे देश को वैसे ही अचंभित किया जैसे मुंबई, चेन्नई, केरल या फिर श्रीनगर की बाढ़ ने पूर्व में किया था।देखते ही देखते 11 राज्यों में नदियां खतरे के निशान से ऊपर बहने लगी। प्रशासन भी जरूरी काम समझ कर राहत और बचाव काम में जुट गया।

शहरों में तो सरकार के साथ-साथ कई प्रकार के स्वयंसेवी संगठन भी बचाव और राहत के लिए आगे आ जाते हैं लेकिन ग्रामीण भारत को आज भी कमोबेश उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है।ग्रामीण भारत में बाढ़ से हर साल बहुत बड़ी आबादी प्रभावित होती है, फसली क्षेत्र की बहुत हानि होती है। गरीबों के घर उजड़ जाते हैं पशुओं के बाड़े नष्ट हो जाते हैं। गांव में मानव के साथ-साथ पशुओं की भी भारी हानि होती है। वर्ष 2022-23 की बाढ़ का आकलन देखें तो देश मैं बाढ़ से 18.54 लाख हेक्टेयर फसली क्षेत्र प्रभावित रहा। इस दौरान 1997 लोगों की मौत हुई जबकि 30615 पशु मृत पाए गए। बाढ़ में जिनके पशुओं की मृत्यु हो जाती है उन पर दुखों का पहाड़ टूट जाता है। दुख की बात है कि देश में आपदाओं के वक्त पशुओं को बचाने के लिए बुनियादी तंत्र तक नहीं है।जब कभी सूखा पड़ता है तो कई राज्यों में पशुओं के लिए कुछ इंतजाम होते हैं पर बाढ़ में तो सारी मशीनरी मनुष्य को बचाने में लग जाती है और बेजुबान पशु ईश्वर के रहमो करम पर छोड़ दिए जाते हैं।पशुओं को बचाने के लिए ना तो किसी राज्य में कोई प्रशिक्षित टीम है ना उनके लिए अलग कैंप की तैयारी की जाती है और ना ही उनके लिए पहले से चारा पानी का कोई इंतजाम होता है। बाढ़ की आपदा के समय पशुओं के लिए आवश्यक दवाइयों का अभाव तो होता ही है पशु चिकित्सक भी खोजे नहीं मिलते।

पशु संपदा के मामले में भारत दुनिया में सबसे धनी देश है। दुनिया का सबसे अधिक पशुधन भारत के पास है। दुनिया की भैंसों का 57 प्रतिशत और कुल मवेशियों का करीब 15 प्रतिशत भारत में है। बड़ी संख्या में लोग पशुपालन में लगे हैं जिनमें छोटे किसान सबसे अधिक 87 प्रतिशत तक है। दूध उत्पादक किसानों में 70 प्रतिशत के पास एक से तीन पशु हैं। अनेक भूमिहीनों तथा वंचित वर्ग के लोगों की आजीविका पशुपालन से ही चलती है। एक हेक्टेयर से कम रकबा वाले किसानों के पास 37 प्रतिशत पशुधन है। इन सब के बूते ही भारत दूध उत्पादन में दुनिया में शीर्ष पर है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हर साल औसतन बाढ़ से 75 हजार से एक लाख पशु मर जाते हैं। इनमें काफी संख्या में दुधारू पशु भी होते हैं। वर्ष 2000 से 2014 के बीच देश में लगभग 12 लाख जानवरों की मौत आपदाओं से हुई। हाल के सालों का आंकड़ा देखें तो 2015 में 50000 पशु मरे, वही 2016 में 22367 पशु मर गए। वर्ष 2017 में 26673, वर्ष 2018 में 60279 पशु मर गए थे। वर्ष 2019 में 25852 पशु तथा 2020 में 45463 पशुओं की मौत हो गई थी। आपदाओं में बचाव के लिए एनडीआरएफ की कुल 334 टीमें देश के विभिन्न भागों में तैनात हुई थी। बचाव टीम ने इस दौरान लगभग 98962 लोगों को बचाया लेकिन मात्र 617 पशुओं को बचाने में ही कामयाब हुए।

जब भी कोई बाढ़ या अन्य आपदा आती है तो सबसे पहले मानव जाति के बारे में सोचा जाता है। हम पशु को धन मानते हैं लेकिन आपदाओं में उनको  कैसे बचाया जाए इस बारे में कुछ नहीं सोचते। पशुओं को लेकर लोगों में जागरूकता का भी अभाव है।आपदा के समय बड़े-बड़े नेता हेलीकॉप्टरों पर बैठकर हवाई सर्वेक्षण करने लगते हैं लेकिन पशुओं को आपदा प्रबंधन का हिस्सा बनाने की बात नहीं होती। तमाम पशु खूटे से बधे बधे ही डूब कर मर जाते हैं। दुधारू पशुओं के मर जाने से गरीब किसान की रीढ़ टूट जाती है। लेकिन विडंबना पूर्ण है कि सरकार के पास पशुओं के मरने से होने वाली आर्थिक क्षति का न तो कोई आंकड़ा है और ना ही इस नुकसान की भरपाई का कोई तंत्र।

पशु ग्रामीण भारत की जीवन रेखा है और करोड़ों परिवार का पेट पशुओं से पलता है। देश में पशु चिकित्सकों का ढांचा बहुत कमजोर है। लगभग 15000 पशुओं पर एक पशु चिकित्सक है जबकि कायदे से 5000 पशुओं पर एक चिकित्सक होना चाहिए। आपदा प्रबंधन का काम पहले कृषि मंत्रालय के तहत था अब गृह मंत्रालय के पास है। आपदा में पशुओं के मरने संबंधी सवालों को संसद यह कहकर टाल देती है कि यह राज्यों का विषय है। कुछ राज्यों में दुधारू पशु जैसे भैंस, गाय, ऊंट के मामले में 30000 रूपये तक और भेड़ बकरी सूअर के मामले में 3000 रूपये तक की मदद का प्रावधान है। इसी तरह कुछ राज्यों में बछड़ा, गधा, खच्चर के मामले में 16000 रूपये तक के मुआवजे की बात है, लेकिन लाल फीताशाही की जकड़न के कारण यह मदद शायद ही किसी पीड़ित तक पहुंच पाती है। ठीक है कि मनुष्य का जीवन सर्वोपरि है उसे उच्च प्राथमिकता के साथ डील किया जाना चाहिए लेकिन आपदाओं के वक्त पशुओं को बचाने के लिए भी किसी ठोस तंत्र की बात अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि भारत एक पशु प्रधान देश भी है।           

लेखक- कार्यक्रम अधिकारी, आकाशवाणी, दिल्ली

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कुदरत से खिलवाड़ के फलितार्थ

क्या यह सही समय नहीं है कि पेरिस समझौते को  लागू करने के लिए वैश्विक दबाव बढ़ाने के साथ-साथ हम परिवेश और प्रकृति के प्रति अपने व्यवहार की समीक्षा करें और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के स्थान पर उन विकल्पों पर भी विचार करें जो समूची मानवता को लोभ, स्वार्थ और हम बड़े के दम्भ से दूर एक खुशहाल जीवन का आश्वासन दे। - शिवनंदन लाल

 

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनडीपी) की ओर से ताजा-ताजा आई एमिशन गैप रिपोर्ट दुनिया के सभी देशों के लिए चेतावनी है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि यदि सभी देश पेरिस समझौते के वादों को पूरा नहीं करते हैं तो इस सदी के अंत तक दुनिया 2.5 डिग्री से बढ़कर 2.9 डिग्री तक गर्म हो जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया का तापमान नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। इस साल अक्टूबर तक 86 दिन ऐसे रहे, जब दुनिया का तापमान सामान्य से 1.5 डिग्री अधिक था। इसी साल का सितंबर महीना अब तक का सबसे गर्म महीना घोषित किया गया। सितंबर में तापमान सामान्य से 1.8 डिग्री अधिक रहा था। वर्ष 2021 से जुलाई 2023 तक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 1.3 प्रतिशत का इजाफा हुआ जो 59.4 गीगाटन कार्बन डाईऑक्साइड के बराबर है।

जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया भर में हलचल है। मानों प्रकृति अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार से अब अकुलाने लगी है। जिन इलाकों में सुखे का लंबा इतिहास रहा है, उन इलाकों में अब बाढ़ के मंजर दिखाई देने लगे हैं। जिन इलाकों में कभी भारी बारिश हुआ करती थी, वे इलाके बारिश के लिए तरसते नजर आ रहे हैं। स्थिति का अनुमान जैसलमेर शहर से लगाया जा सकता है। जैसलमेर राजस्थान का वह इलाका है जहां पानी की उपलब्धता सबसे कम हुआ करती थी। इस इलाके में बारिश का इतिहास भी काफी सीमित और नपा तुला ही रहा है। लेकिन दो साल पहले जैसलमेर में भारी बारिश के बाद आई अचानक बाढ़ का मंजर देखकर लोगों के कान खड़े हो गए थे। बाढ़ के उफान में बड़ी-बड़ी गाड़ियां बहती नजर आई थी। जैसलमेर में यह सब तब हो रहा था जब बरसात के लिए भारत में मशहूर चेरापूंजी का इलाका बारिश के लिए बादलों की ओर टकटकी लगाए था। जब भारत की जमीन पर इस तरह की प्राकृतिक अनहोनी हो रही थी, ठीक उसी समय सदैव 20 डिग्री सेल्सियस के तापमान वाले रूस के याकुतश्क शहर का तापमान अचानक बढ़कर 36 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। कैलिफोर्निया की डेथ वैली में 54.4 डिग्री तापमान दर्ज किया गया था, जबकि उससे बहुत ठंडा समझे जाने वाले शहर लॉस वेगास का पारा 48 डिग्री के पार चला गया था। इसी समयावधि में जर्मनी में हुई लगातार बारिश ने पिछली सदी का रिकॉर्ड तोड़ दिया था। इस तरह की उलट-पुलट की घटनाएं स्पष्ट संकेत दे रही है कि कुदरत के मिजाज ठीक नहीं है।

सारी दुनिया में सामान्य तापमान बढ़ रहा है। वैज्ञानिक भाषा में इसे ग्लोबल वार्मिंग या वैश्विक तापमान का बढ़ना कहा जाता है। इसके खतरों से वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् लगातार आगाह कर रहे हैं, लेकिन कथित विकास की व्यग्रता में दुनिया उन तथ्यों को भी नजरअंदाज कर रही है जो समूची मानव सभ्यता के लिए किसी बड़े खतरे की प्रस्तावना की तरह है। बार-बार आने वाले समुद्री तूफान, चक्रवात, हिमनदों का फटना, सतत भूस्खलन, कहीं भीषण गर्मी तो कहीं भीषण सर्दी, लगातार बारिश, लगातार भूकंप और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जंगलों का धधकना इस बात की ओर इशारा करता है कि जलवायु के आंगन में गहरी उथल-पुथल है, और इसे मनुष्य यह सोचकर अनदेखा नहीं कर सकता कि किसी और के आंगन में आग से हमें क्या लेना देना? जब दुनिया के किसी भी हिस्से में बड़ी पर्यावरणीय हलचल होती है तो वह समूचे मानव समुदाय के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए, क्योंकि यदि जंगल में किसी एक पेड़ में लगी आग को बाकी पेड़ यह सोचकर  अनदेखा करेंगे कि उन्हें इससे क्या, तो सारा जंगल आग के आतप और आतंक से बहुत देर तक नहीं बच सकेगा।

विकास के नाम पर हमने जिस जीवन शैली को अपनाया है उसके चलते वातावरण में लगातार विषैली गैसों का उत्सर्जन हो रहा है। पराबैंगनी किरणों को हम तक पहुंचने से रोकने वाली ओजोन परत कमजोर पड़ने की चिंता जानकारों को लगातार परेशान कर रही है। दूसरी तरफ पर्यावरण में एअरोसाल की बढ़ती हुई मात्रा पृथ्वी के जल चक्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। एअरोसाल, गैस के साथ ठोस कणों या बूंदों के मिश्रित होने की स्थिति को कहते हैं और इसकी अत्यधिक मात्रा के कारण मानसून का व्यवहार भी अनियमित हो गया है।

मानसून का चाल-ढाल भी बदल गया है। इस साल अक्टूबर महीने में अचानक मानसून की सक्रियता बढ़ गई। 10 से 15 अक्टूबर के बीच देश के कई हिस्सों में भारी बारिश हुई। विक्रमी संवत के अनुसार यह आश्विन माह का शुक्ल पक्ष होता है। मानसून की असमय सक्रियता से अचानक सर्दी के आने की आशंका पैदा हुई। लोकमान्यताएं भी कहती हैं कि जब भी मानसून अनियमित व्यवहार करता है तो जीवन को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना ही होता है। इस साल तो मौसम में इतने उलट फेर हुए की तमाम मौसम वैज्ञानिकों ने इस साल के मौसम को रिकॉर्ड तोड़ने वाला मौसम तक कह दिया। इससे पहले नासा की एक रिपोर्ट में वर्ष 2020 को सबसे गर्म साल बताया गया था। इससे भी पहले अप्रैल 2017 में क्लाइमेट सेंटर नाम के अंतरराष्ट्रीय संगठन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पिछले 628 महीना में से कोई भी महीना उतना ठंडा नहीं रहा जितना पूर्ववर्ती वर्ष में वह महीना रहा करता था। यानी पृथ्वी के आसपास का तापमान लगातार बढ़ता रहा। अब यूएनईपी ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया के देश पेरिस समझौते पर काम नहीं करते है तो सदी के अंत तक पृथ्वी का तापमान 2.9 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो सकता है।

इसी साल जी-20 की बैठक के दौरान बढ़ते वैश्विक तापमान को लेकर जारी किए गए परिपत्र में कहा गया कि तापमान में वृद्धि के कारण पहले से ही मानव और प्राकृतिक प्रणाली में बड़ा बदलाव हो रहा है। इस बदलाव को हिमनदों की मौजूदा स्थिति से भी आंका जा सकता है। पिछले दिनों एक अध्ययन में यह बात सामने आई की सन 2000 के बाद हर साल 280 अरब टन हिमनद गायब हुए हैं। हिमनदों का गायब होना वस्तुतः उनका पिघलने ही है। दुनिया भर में समुद्रों में पानी की जो बढ़ती मात्रा पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है, उसमें 21 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पिघलते हुए हिमनदों का ही है। हिमनदों का पिघलना पहाड़ी आबादी के लिए परेशानी का भी सबब है। हिमनदों के पिघलने से पहाड़ी क्षेत्रों में झील बन जाती है और जब वह झील फटती है तो इलाके में तबाही मचा देती है। दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत श्रृंखला माउंट एवरेस्ट लगातार गर्म हो रही है और गर्मी के कारण उसके आसपास के हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं।

इसे हम ग्रीन हाउस प्रभाव कहें या वैश्विक तापमान का बढ़ना कहें या कोई और नाम दे, लेकिन सच तो यही है कि प्रकृति का आधिकारिक दोहन करने की हमारी नीतियों और मानसिकता ने समूची मानव जाति को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हम सबको प्रकृति और मनुष्य की आत्मीयता के समीकरण को फिर से साधना ही होगा। भारतीय संस्कृति में शायद इसीलिए कभी देवताओं के रूप में तो कभी परंपराओं के तौर पर प्राकृतिक शक्तियों की सामर्थ्य को नमन किया जाता रहा है।

दुनिया के देशों ने पेरिस समझौते के तहत क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग से बचने के लिए वैश्विक गैस का कम से कम उत्सर्जन करने का वादा किया है। छोटे देशों पर इसके लिए दबाव भी बढ़ाया जा रहा है और कई एक विकासशील देश इस दिशा में ठोस कार्य नीति के साथ आगे भी आ रहे हैं, लेकिन बड़े और विकसित देश लगातार अंगूठा दिखा रहे हैं।

ऐसे में, क्या यह सही समय नहीं है कि पेरिस समझौते को  लागू करने के लिए वैश्विक दबाव बढ़ाने के साथ-साथ हम परिवेश और प्रकृति के प्रति अपने व्यवहार की समीक्षा करें और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के स्थान पर उन विकल्पों पर भी विचार करें जो समूची मानवता को लोभ, स्वार्थ और हम बड़े के दम्भ से दूर एक खुशहाल जीवन का आश्वासन दे।    

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दलहन और तिलहन के मोर्चे पर भी शीघ्र आत्मनिर्भरता के आसार

पिछले दस वर्षों में दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में दो गुना से ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है, जिससे 2013-14 फसल वर्ष (जुलाई-जून) के 1.92 करोड़ टन से बढ़कर दालों का उत्पादन 2022-23 में 2.605 करोड़ टन हो गया है। - शिवनंदन लाल

 

केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय के मुताबिक वर्ष 2028 के जनवरी तक भारत दलहन और तिलहन के मामले  में उसी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा, जैसे- गेहूं, धान, गन्ना के मामले में हो चुका है। सरकार ने इसके लिए दाल खरीद मंच का गठन किया है। इस नीति के मुताबिक किसान दलहन की फसल बोने से पहले राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन और सहकारी उपभोक्ता महासंघ लिमिटेड को अपनी उपज बेचने के लिए पंजीकरण करा सकेंगे, जिससे उन्हें इनका उचित मूल्य मिल सकेगा। किसान चाहें तो खुले बाजार में भी इन्हें बेच सकते हैं। सहकारिता मंत्री ने स्वीकार किया कि किसान फिलहाल अरहर की खेती करने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं, जिसकी वजह से देश में चना और मूंग को छोड़ कर दूसरी सभी दालों की कमी बनी रहती है। इस कमी को पूरा करने के लिए दालों को आयात करना पड़ता है। पर सवाल है कि क्या यह मंच बनने से दालों के उत्पादन में वृद्धि हो सकेगी?

गौरतलब है कि पिछले दस वर्षों में दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में दो गुना से ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है, जिससे 2013-14 फसल वर्ष (जुलाई-जून) के 1.92 करोड़ टन से बढ़कर दालों का उत्पादन 2022-23 में 2.605 करोड़ टन हो गया है। हालांकि, दालों का घरेलू उत्पादन अब भी खपत से काफी कम है। आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 और 2022-23 के बीच मूल्य के संदर्भ में वनस्पति तेलों का आयात दोगुने से भी अधिक हुआ। यह आयात भारत की वनस्पति तेल आवश्यकताओं का तकरीबन साठ फीसद से भी ज्यादा होता है। अगर तिलहन और दलहन के मामले में देश आत्मनिर्भरता हासिल कर ले, तो वनस्पति तेलों के आयात में कमी लाई और इससे हर साल हजारों करोड़ रुपए बचाए जा सकते हैं।

देश के बड़े राज्यों में सबसे ज्यादा दलहन का उत्पादक राज्य राजस्थान है। वहां दालों का उत्पादन  देश के कुल उत्पादन का 19.53 फीसदी है। इसके बाद मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक जैसे राज्यों में दलहन का उत्पादन सबसे ज्यादा होता है। इन राज्यों में आज जितना दलहन और तिलहन का उत्पादन हो रहा है, वह एक-दो दशक पहले आज की तुलना में ज्यादा हुआ करता था। आज ये राज्य दलहन में काफी पीछे हैं, खासकर अरहर के उत्पादन में। ऐसे में सरकार ने जो उम्मीद जताई है, वह क्या 2028 तक पूरा हो सकेगी?

राज्यों में दलहन और तिलहन उत्पादन की जमीनी हकीकत कुछ और है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में दलहनी फसलों, खासकर अरहर बोने से किसान इसलिए कतराने लगे हैं कि यह समय ज्यादा लेती है और उस एवज में इससे आमदनी बहुत कम होती है। दूसरी बात, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में नीलगाय और छुट्टा जानवरों की वजह से सारी फसल बर्बाद हो जाती है। लागत मूल्य भी निकलना मुश्किल हो जाता है। मौसम की मार और रोग लगने की वजह से अरहर, मूंग जैसी दालों से कुछ बचत नहीं होती। इस वजह से दलहन और तिलहनों के उत्पादन में वैसी वृद्धि नहीं हो पाई है, जैसी उम्मीद की जा रही थी। इसलिए 2022-23 के नवंबर-अक्तूबर के दौरान देश में खाद्य तेलों का आयात तेजी से बढ़कर 164.66 लाख टन हो गया, जबकि इसी दौरान दलहनों के आयात में भी अच्छी बढ़ोतरी देखी गई।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक के दौरान देश में अनेक कृषि जिंसों का उत्पादन उछलकर नए कीर्तिमान पर पहुंच गया, लेकिन कुछ अनाजों के आयात पर निर्भरता में कमी आने के बजाय वृद्धि दर्ज की गई, इनमें दलहन और खाद्य तेलों का आयात प्रमुख है। सरकार इसके पीछे दक्षिण-पश्चिम मानसून में अनिश्चितता को वजह बताती है। अगस्त- अक्तूबर के शुष्क तथा गर्म मौसम ने अनेक खरीफ फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसमें अरहर, उड़द और मूंग प्रमुख हैं। सोयाबीन और मूंगफली के उत्पादन पर भी असर पड़ा है। अरहर के उत्पादन में पिछले दो दशकों में, खासकर उत्तर प्रदेश में कमी होती गई। इसके पीछे वजह मौसम ही नहीं, स्थानीय समस्याओं के साथ इनसे होने वाली आय का न होना भी है। अब किसान घाटे की कोई फसल उगाना नहीं चाहता। अरहर रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली दाल है, इसके बावजूद किसान अगर इसको बोने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं, तो उन कारणों को खोजे बगैर 2028 तक अरहर और अन्य दलहन के मामले में देश आत्मनिर्भर हो जाएगा, कहना मुश्किल है।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र सहित देश के तमाम राज्यों में सरकारों की तरफ से तिलहनी और दलहनी फसलों पर अधिक ध्यान दिए जाने के बावजूद इनके उत्पादन का लक्ष्य हासिल नहीं हो पा रहा। इसकी वजहों पर सरकारों को गौर करना चाहिए। अरहर, मूंग और उड़द के लिए अलग से फसल बीमा योजना शुरू करने की जरूरत है। इससे किसानों को प्रोत्साहन मिलेगा और वे निश्चित होकर अरहर यानी तुअर प्राथमिकता से बोने को तैयार हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि अरहर, मूंग और उड़द में लागत उतनी नहीं लगती, जैसी दूसरी फसलों के बोने और तैयार करने में लगती है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अगर दलहन की फसल छुट्टा जानवरों या मौसम की मार से बर्बाद हो गई, तो उसकी पूरी भरपाई शासन की तरफ से हर हाल में की ही जाएगी।

गौरतलब है कि इससे किसानों को जमीन अधिक उर्वर बनाने में मदद मिलेगी। अरहर की जड़ें मूसलाधार होती हैं। यह जमीन के नीचे की उर्वरता और कम पानी खींचकर भी तैयार हो जाती है। यह कृषि अनुसंधानों से पता लगाया जा चुका है। अरहर की पत्तियां झड़कर खेत की उर्वरता बढ़ाती हैं। ये सब अरहर की फसल उगाने के फायदे हैं, जिन्हें किसानों को प्रोत्साहन में समझाया जा सकता है। यानी इसे अपनाकर रासायनिक खादों की खपत में भी कमी लाई जा सकती।

राजस्थान दलहन और गुजरात तिलहन उत्पादन में अव्वल है। जिन वजहों से इन दोनों प्रदेशों में देश में सबसे ज्यादा दलहन और तिलहन का उत्पादन होता है, उन वजहों को गहराई से समझ कर जो प्रदेश दलहन और तिलहन उत्पादन के मामले में बहुत पीछे हैं, वहां ’प्रयोग’ के तौर पर राज्य सरकारों को लक्ष्य निर्धारित करके आगे बढ़ना चाहिए। भारत का किसान परंपरागत खेती को ही अभी प्राथमिकता देता है। तिलहन और दलहन की फसलों को वैज्ञानिक ढंग की खेती के रूप में किसानों को प्राथमिकता देनी चाहिए और इसके लिए उन्हें जिला स्तर पर प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए। इससे जहां उत्पादन बढ़ेगा वहीं पर खेती- किसानी के प्रति गांवों में जो अरुचि पैदा होती जा रही है, उसमें कमी लाने में मदद मिल सकेगी।

केंद्र सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती है। उसके लिए दलहन और तिलहन फसलों के उत्पादन पर जोर देकर इसे अमली जामा पहनाया जा सकता है। इससे जहां दालों को लेकर गांवों और शहरों में जो मारामारी के हालात अक्सर बनते रहते हैं, उससे निजात मिलेगी और दलहन के लिए करोड़ों रुपए का आयात जो हर वर्ष हो रहा है, उसे भी काफी हद तक कम या खत्म किया जा सकेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र और राज्य सरकारें दलहन तथा तिलहन के उत्पादन को बढ़ाने में जमीनी समस्याओं से रूबरू होकर समाधान की दिशा में आगे बढ़ेंगी।        

(लेखक आकाशवाणी नई दिल्ली में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी हैं।)

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बे-मौसम बरसात से तहस-नहस हो गई दलहन-तिलहन की खेती

प्राकृतिक आपदाओं या जलवायु परिवर्तन के असर को समाप्त करना संभव नहीं है फिर भी समय पर अग्रिम तैयारी करके इसके प्रभाव को सीमित जरूर किया जा सकता है। विशेषकर विपरीत परिस्थितियों में भी खेती किसानी से जुड़े लोगों को संभालने की जिम्मेवारी कल्याणकारी राज्य को उठानी ही चाहिए। - शिवनंदन लाल

 

बारिश को आमतौर पर प्रकृति का वरदान कहा जाता है, लेकिन तब, जब समय पर हो? मशहूर ग्रामीण कृषि विज्ञानी घाघ ने खेती के लिहाज से बारिश के बारे में चेताते हुए कहा है “अगहन दूना, पुस सवाई। माघ फागुन में घरों के जाई“।। हालिया बे-मौसम की बारिश से महाकवि की उक्ति चरितार्थ हुई है। उतरते माघ और चढ़ते फागुन में रुक-रुक कर हुई कई दिनों की बारिश ने अन्नदाताओं की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। चना, मसूर, तिलहन की खेती करने वाले किसानों की कमर टूट गई है, खेती से आमदनी तो दूर, जिन किसानों ने किराए पर खेत और कर्ज लेकर दलहन-तिलहन की खेती की है उनकी लागत भी निकलने की गुंजाइश नहीं है।

खेती किसानी पर संकट के बादल कुछ सालों से लगातार मंडरा रहे हैं। किसान की लागत भी वसूल नहीं हो पा रही है। किसान अपनी लागत और पैदावार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी के लिए लगातार आंदोलन भी कर रहे हैं। ऊपर से प्रकृति भी उनका साथ नहीं दे रही है। रुक-रुक कर इधर हुई तीन-चार दिनों की बारिश से फसलों की भारी हानि हुई है। इस हानि की भरपाई कौन करेगा, इसकी गारंटी कोई नहीं देता? हालांकि कई प्रदेशों की सरकारों ने मुआवजा देने का ऐलान किया है, लेकिन इस तरह का मुआवजा कब और कितने दिनों बाद दिया जाता है और पीड़ित को क्या मिलता है, इसकी कड़वी सच्चाई से किसान पूरी तरह वाकिफ है। साधारण और साफ शब्दों में कहें तो लाखों के नुकसान पर सैकड़ो के मुआवजे की व्यवस्था होती है वह भी महीनों चप्पल घिसने के बाद।

पिछले साल भी अप्रैल के महीने में असमय बारिश से हुए नुकसान की भरपाई के लिए राज्य सरकारों ने 75 प्रतिशत से अधिक के नुकसान पर 12 हजार से लेकर 15 हजार प्रति एकड़ राहत राशि का निर्णय लिया था,लेकिन अधिकांश किसानों को इसका लाभ नहीं मिल सका। दरअसल मौसम की वजह से हुए नुकसान पर सरकारें तात्कालिक रूप से सहायता की घोषणाएं तो करती ही हैं, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत भी किसानों को राहत दी जाती है, लेकिन इस योजना में किसानों को कई तरह की व्यवहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। विडंबना यह है कि ऐसे मामलों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसी दीर्घकालिक नीति नहीं बन पाई जो किसानों को स्थाई रूप से राहत प्रदान कर सके। यही कारण है कि कृषि के क्षेत्र में विभिन्न स्तरों पर प्रगति होने के बावजूद आज भी खेती करना चुनौती पूर्ण काम है। इस प्रगतिशील दौर में भी खेती काफी हद तक मौसम पर निर्भर है। जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित मानसून के चलते भी खेती की चुनौतियां लगातार बढ़ती ही जा रही है। किसान इन चुनौतियों के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

मौसम अनुकूल रहने के कारण इस बार रवि की खेती खासकर दलहन और तिलहन बड़ी मात्रा में और समय से हुई थी। अगहन और पूस के महीने में कुदरत भी मेहरबान थी। फसल उठान पर थी। लहलहाती फसल के भरोसे खेतिहर किसान इस सीजन में अपने कई अरमान भी पूरे करने का सपना देख रहे थे। लेकिन बारिश ने रबी की फसलों को नष्ट कर दिया। मसूर, चना, तिलहन तहस नहस हो गया, वहीं तेज हवा के झोंकों से गेहूं की फसल जमीन पर बिछ गई। रही सही कसर ऊपर से गिरे ओले ने पूरी कर दी।

बे-मौसम की बारिश मौसम वैज्ञानिकों के लिए भी चुनौती बनी हुई है। जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप ग्लोबल वार्मिंग, दुर्बल पश्चिमी विक्षोभ और प्रबल उष्णकटिबंधीय जेट स्ट्रीम को मोटे तौर पर बेमौसम बारिश का कारण बताया जाता रहा है लेकिन इन दोनों अल नीनो परिघटना केंद्र में है। अल नीनो में पश्चिमी प्रशांत महासागर का गर्म जल पूर्व की ओर प्रवाहित होता है, जिसके परिणाम स्वरुप कुछ क्षेत्रों में सुखे की स्थिति जबकि उसी समय में अन्य क्षेत्रों में बे-मौसम बारिश की स्थिति उत्पन्न होती है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने कहा है कि वर्ष 2023 24 की अल नीनो परिघटना ने अब तक के पांच सर्वाधिक प्रचंड अल नीनो में से एक होने का रिकॉर्ड कायम किया है जो कमजोर रुख के बावजूद आने वाले महीनों में भी वैश्विक जलवायु को प्रभावित करना जारी रखेगी। संगठन ने जानकारी दी है कि मार्च से लेकर मई के दौरान अल नीनो के बने रहने की 60 प्रतिशत संभावना है। भारतीय वैज्ञानिकों का मानना है कि जून से अगस्त तक ला नीना की स्थिति बनने का मतलब यह हो सकता है कि इस साल मानसून की बारिश पिछले साल की तुलना में बेहतर होगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो का वैश्विक जलवायु पर सर्वाधिक प्रभाव इसके उत्पन्न होने के दूसरे साल देखने को मिलता है, इसलिए भी अबकी बार वर्ष 2024 में इसका प्रभाव दिखेगा। वर्तमान अल नीनो घटना जो जून 2023 में विकसित हुई नवंबर और जनवरी के बीच सर्वाधिक प्रचंड थी। इसके चलते समुद्री सतह तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया। भारतीय वैज्ञानिकों का एक मत यह भी है कि इस बार पहाड़ों में बर्फबारी और बारिश देर से और कम होने के कारण पश्चिमी विक्षोभ कमजोर पड़ा और ऊपर-ऊपर ही निकल गया, जिसके कारण मौसम में तब्दीली होती रही। अल नीनो प्रभाव के कारण दुनिया के स्तर पर वर्ष 2023 सबसे गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया जा चुका है। जंगलों की कटाई, अंधाधुंध शहरीकरण, बेतहाशा प्रदूषण जैसी मानवीय गतिविधियां भी बदलते मौसम मिजाज का कारण है।

अधिकांश फसल अभी फूल पर थी। जिन फसलों में दाने आ रहे थे उनका दाना अभी पुष्ट नहीं हुआ था। जिन किसानों ने तिलहन की फसल काट ली थी अब उसके सड़ जाने का खतरा बढ़ गया है। देशभर में बेतहाशा बारिश के साथ-साथ कई जगहों पर मोटे-मोटे ओले भी पड़े हैं। बारिश की वजह से जो फसलें खेतों में गिर गई है उनका फिर से खड़ा होना और खड़ा होने के बाद उसके दाने का बना रहना मुश्किल है। मसूर, सरसों, सब्जियां, प्याज आदि की फसलों को कुछ अधिक ही नुकसान हुआ है। ये ऐसी फसलें होती है जो कमजोर मानी जाती हैं और हल्की बारिश में भी खराब हो जाती है। नुकसान को देखने के बाद किसान अपना कलेजा पकड़कर खेतों की मेड़ों पर बैठे हैं। उनके रोने-चिल्लाने की तस्वीरें इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब फैल रही है। 

फसलों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय स्तर पर जो योजनाएं हैं, कुदरती आपदाओं के समय छोटे किसानों के काम नहीं आती हैं। कम जोत वाले किसान की पहुंच प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना तक अब भी नहीं है।

दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कृषि के क्षेत्र में अनेक शोध और अध्ययन होने के बावजूद किसानों पर लगातार मौसम की मार पड़ रही है। न तो अकादमी की जगत और न हीं सरकार कोई ऐसा तंत्र विकसित कर पाए हैं जो मौसम की मार से किसानों को राहत दिला सकें। असामान्य मौसमी घटनाओं ने इतना विकराल रूप ले लिया है की आजीविका और जीवन के लिए ही संकट उठ खड़ा होने को है। ऐसे में कृषि क्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस नीति बनाने की जरूरत है, जो किसानों को त्वरित राहत के लिए एक ठोस तंत्र स्थापित करें और सभी तरह की प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए एक छत के नीचे समाधान तलाशे। हालांकि प्राकृतिक आपदाओं या जलवायु परिवर्तन के असर को समाप्त करना संभव नहीं है फिर भी समय पर अग्रिम तैयारी करके इसके प्रभाव को सीमित जरूर किया जा सकता है। विशेषकर विपरीत परिस्थितियों में भी खेती किसानी से जुड़े लोगों को संभालने की जिम्मेवारी कल्याणकारी राज्य को उठानी ही चाहिए।   

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नकली और मिलावटी दवाओं से नागरिकों को बचाने की जरूरत

नकली दवाओं को बनाना-बेचना भ्रष्टाचार ही नहीं, मानवीय सेहत के लिए एक बड़ा खतरा भी है। ऐसे में नियामकीय व्यवस्था को मजबूत बनाने से ही नकली और मिलावटी दवाओं से निजात मिलेगी। - शिवनंदन लाल

 

दवाएं बीमारी के वक्त शरीर को स्वस्थ बनाने के साथ गंभीर स्थिति में जीवन रक्षक होती हैं। स्वास्थ्य के लिए वरदान समझी जाने वाली यही दवाएं यदि मुनाफाखोरी का जरिया बन जाएं तो सेहत की दुश्मन बन जाती हैं। पिछले सप्ताह दिल्ली पुलिस ने नकली दवाओं के एक बड़े गिरोह को पकड़ा। पुलिस ने आरोपितों के पास से कैंसर की अलग-अलग ब्रांड की नकली दवाएं बरामद कीं। इनमें सात दवाएं विदेशी और दो भारतीय ब्रांड की हैं। आरोपी कीमोथैरेपी के इंजेक्शन में पचास से सौ रुपये की एंटी फंगल दवा भरकर एक से सवा लाख रुपये में बेच रहे थे। कुछ दिन पहले ही तेलंगाना में औषधि नियंत्रक प्रशासक ने चाक पाउडर से भरी डमी गोलियां बरामद कीं। इसी तरह गाजियाबाद में नकली दवा बनाने वाली एक फैक्ट्री पकड़ी गई थी। देश के अलग-अलग हिस्से से आए दिन गुणवत्ताविहीन और मिलावटी दवाओं के कारोबार से जुड़े मामले प्रकाश में आते रहते हैं। एक ही मर्ज की बाजार में मिलने वाली अलग-अलग ब्रांड की दवाओं की दक्षता में अंतर होना चिंताजनक है। नकली और मिलावटी दवाएं जहां बीमारी से लड़ने में असरदार नहीं होती हैं, वहीं वे दूसरे रोगों का कारक बनती हैं। इनका सेवन गुर्दे, यकृत, हृदय और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता हैं। गुणवत्ताविहीन दवाएं निर्यात के मोर्चे पर देश की साख भी कमजोर करती हैं। लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वाली ये गतिविधियां अब संगठित अपराध की शक्ल ले चुकी हैं।

दवा निर्माण एक चरणबद्ध प्रक्रिया है। ये नैदानिक परीक्षण के बाद उपभोक्ताओं तक पहुंचती हैं। दवा कंपनियों में प्रयोगशालाएं होती हैं, जहां प्रत्येक चरण का आकलन कर दवा को अंतिम रूप दिया जाता है। भारतीय भेषज संहिता (आइपीसी) और भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त अन्य फार्मूले से दवाओं का निर्माण, परीक्षण और संधारण होता है। हर दवा निर्माता कंपनी के लिए तय प्रोटोकाल का पालन अनिवार्य है। देश में नकली और मिलावटी दवाओं पर रोक लगाने के लिए औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 में दंड और जुर्माने का प्रविधान है। इसके अंतर्गत नकली दवाओं से रोगी की मौत या गंभीर चोट पर आजीवन कारावास की सजा है। मिलावटी या बिना लाइसेंस दवा बनाने पर पांच साल की सजा का प्रविधान है। इस अधिनियम के अंतर्गत स्थापित केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन दवाओं, सौंदर्य प्रसाधनों और चिकित्सा उपकरणों का राष्ट्रीय नियामक है। भारत के औषधि महानियंत्रक दवाओं के निर्माण, बिक्री, आयात और वितरण से जुड़े मानक निर्धारित करते हैं। यह राज्यों के खाद्य एवं औषधि नियामक प्राधिकरणों के साथ समन्वय भी स्थापित करता है। राज्य स्तर पर औषधि नियंत्रक एवं जिलों में निरीक्षक दवाओं की गुणवत्ता निर्धारित करने वाली सबसे अहम कड़ी हैं।

देश के अलग-अलग राज्यों में 29 दवा परीक्षण प्रयोगशालाएं हैं। इसके अलावा आठ केंद्रीय लैब भी स्थापित हैं। मिलावटी दवाओं पर रोक लगाने के लिए संसाधनों की कमी नहीं है। ऐसे मामलों में राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर नियामक एजेंसियों द्वारा कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है। एक साधारण व्यक्ति के लिए यह समझ पाना आसान नहीं कि किसी दवा का रासायनिक संयोजन क्या है। मरीजों को दवाओं के बारे में जरूरी और स्पष्ट जानकारी भी नहीं दी जाती। कई बार तो पर्चे पर लिखी दवा का नाम उच्च शिक्षित व्यक्ति भी नहीं पढ़ पाता। इसके लिए नियामकों द्वारा समय-समय पर चिकित्सकों को दवाओं के नाम स्पष्ट अक्षरों में लिखने के निर्देश दिए गए हैं। मरीज को लिखी गई दवाओं में किसका क्या काम है, यदि यह जानकारी चिकित्सा द्वारा मरीज को दी जाए तो आपूर्ति तंत्र में घटिया दवाओं की मौजूदगी थमेगी। इससे चिकित्सक - मरीज के बीच भरोसा भी बढ़ेगा।

पिछले साल दवाओं में क्यूआर कोड लगाए जाने की पहल शुरू हुई है। यह सभी दवाओं में अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे दवाओं की कालाबाजारी थमेगी। दवाओं की गुणवत्ता तय करने में फार्माकोविजिलेंस कार्यक्रम काफी मददगार साबित हो सकता है। इसमें दवाओं के प्रतिकूल प्रभावों का अध्ययन कर उन्हें गुणवत्तापूर्ण बनाया जाता है। घटिया दवाओं से जुड़े मामलों की जितनी अधिक शिकायतें होंगी, कानूनी शिकंजा उतना ही सख्त होगा। दवा उद्योग में संदिग्ध गतिविधियों को रोकने के लिए केंद्र सरकार शिकायत प्रणाली को मजबूत कर रही है। कुछ दिन पहले दवा कंपनियों के लिए यूनिफार्म कोड फार फार्मास्यूटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिस (यूसीएमपी), 2024 लागू किया गया है। इसके तहत अब दवा कंपनियों को अपनी वेबसाइट पर शिकायत करने की व्यदस्था देनी होगी। कंपनियां चिकित्सकों को प्रचार के नाम पर उपहार नहीं दे सकेंगी। आयोजन में विशेषज्ञ के तौर पर आमंत्रित किए जाने वाले चिकित्सकों को ही आने-जाने एवं ठहरने की सुविधा दी जा सकती है। ऐसे आयोजनों के खर्च का ब्योरा भी यूसीएमपी के पोर्टल पर साझा करना होगा। यदि फार्मा कंपनियां दवाओं के प्रचार के अनुचित तरीके अपनाती हैं तो सीधे उनके शीर्ष अधिकारी जिम्मेदार होंगे। यूसीएमपी संहिता के एक अन्य प्रविधान के अनुसार एक कंपनी अपनी सालाना बिक्री का सिर्फ दो प्रतिशत निःशुल्क सैंपल दवाएं बांट सकती है। भारतीय दवा उद्योग दुनिया भर में भरोसे का प्रतीक है। वैश्विक स्तर पर 20 प्रतिशत जेनरिक दवाओं की आपूर्ति भारत करता है। 

एक अनुमान के मुताबिक जल्द ही भारतीय दवा बाजार 60.9 अरब डालर के स्तर को पार कर जाएगा। ऐसे में अपने मुनाफे के लिए लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वालों पर समय रहते सख्त कार्रवाई करनी होगी। नकली दवाओं को बनाना-बेचना भ्रष्टाचार ही नहीं, मानवीय सेहत के लिए एक बड़ा खतरा भी है। ऐसे में नियामकीय व्यवस्था को मजबूत बनाकर ही नकली और मिलावटी दवाओं से निजात मिलेगी।

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