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दलहन और तिलहन के मोर्चे पर भी शीघ्र आत्मनिर्भरता के आसार

पिछले दस वर्षों में दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में दो गुना से ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है, जिससे 2013-14 फसल वर्ष (जुलाई-जून) के 1.92 करोड़ टन से बढ़कर दालों का उत्पादन 2022-23 में 2.605 करोड़ टन हो गया है। - शिवनंदन लाल

 

केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय के मुताबिक वर्ष 2028 के जनवरी तक भारत दलहन और तिलहन के मामले  में उसी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा, जैसे- गेहूं, धान, गन्ना के मामले में हो चुका है। सरकार ने इसके लिए दाल खरीद मंच का गठन किया है। इस नीति के मुताबिक किसान दलहन की फसल बोने से पहले राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन और सहकारी उपभोक्ता महासंघ लिमिटेड को अपनी उपज बेचने के लिए पंजीकरण करा सकेंगे, जिससे उन्हें इनका उचित मूल्य मिल सकेगा। किसान चाहें तो खुले बाजार में भी इन्हें बेच सकते हैं। सहकारिता मंत्री ने स्वीकार किया कि किसान फिलहाल अरहर की खेती करने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं, जिसकी वजह से देश में चना और मूंग को छोड़ कर दूसरी सभी दालों की कमी बनी रहती है। इस कमी को पूरा करने के लिए दालों को आयात करना पड़ता है। पर सवाल है कि क्या यह मंच बनने से दालों के उत्पादन में वृद्धि हो सकेगी?

गौरतलब है कि पिछले दस वर्षों में दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में दो गुना से ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है, जिससे 2013-14 फसल वर्ष (जुलाई-जून) के 1.92 करोड़ टन से बढ़कर दालों का उत्पादन 2022-23 में 2.605 करोड़ टन हो गया है। हालांकि, दालों का घरेलू उत्पादन अब भी खपत से काफी कम है। आंकड़ों के मुताबिक 2019-20 और 2022-23 के बीच मूल्य के संदर्भ में वनस्पति तेलों का आयात दोगुने से भी अधिक हुआ। यह आयात भारत की वनस्पति तेल आवश्यकताओं का तकरीबन साठ फीसद से भी ज्यादा होता है। अगर तिलहन और दलहन के मामले में देश आत्मनिर्भरता हासिल कर ले, तो वनस्पति तेलों के आयात में कमी लाई और इससे हर साल हजारों करोड़ रुपए बचाए जा सकते हैं।

देश के बड़े राज्यों में सबसे ज्यादा दलहन का उत्पादक राज्य राजस्थान है। वहां दालों का उत्पादन  देश के कुल उत्पादन का 19.53 फीसदी है। इसके बाद मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक जैसे राज्यों में दलहन का उत्पादन सबसे ज्यादा होता है। इन राज्यों में आज जितना दलहन और तिलहन का उत्पादन हो रहा है, वह एक-दो दशक पहले आज की तुलना में ज्यादा हुआ करता था। आज ये राज्य दलहन में काफी पीछे हैं, खासकर अरहर के उत्पादन में। ऐसे में सरकार ने जो उम्मीद जताई है, वह क्या 2028 तक पूरा हो सकेगी?

राज्यों में दलहन और तिलहन उत्पादन की जमीनी हकीकत कुछ और है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में दलहनी फसलों, खासकर अरहर बोने से किसान इसलिए कतराने लगे हैं कि यह समय ज्यादा लेती है और उस एवज में इससे आमदनी बहुत कम होती है। दूसरी बात, उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में नीलगाय और छुट्टा जानवरों की वजह से सारी फसल बर्बाद हो जाती है। लागत मूल्य भी निकलना मुश्किल हो जाता है। मौसम की मार और रोग लगने की वजह से अरहर, मूंग जैसी दालों से कुछ बचत नहीं होती। इस वजह से दलहन और तिलहनों के उत्पादन में वैसी वृद्धि नहीं हो पाई है, जैसी उम्मीद की जा रही थी। इसलिए 2022-23 के नवंबर-अक्तूबर के दौरान देश में खाद्य तेलों का आयात तेजी से बढ़कर 164.66 लाख टन हो गया, जबकि इसी दौरान दलहनों के आयात में भी अच्छी बढ़ोतरी देखी गई।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक के दौरान देश में अनेक कृषि जिंसों का उत्पादन उछलकर नए कीर्तिमान पर पहुंच गया, लेकिन कुछ अनाजों के आयात पर निर्भरता में कमी आने के बजाय वृद्धि दर्ज की गई, इनमें दलहन और खाद्य तेलों का आयात प्रमुख है। सरकार इसके पीछे दक्षिण-पश्चिम मानसून में अनिश्चितता को वजह बताती है। अगस्त- अक्तूबर के शुष्क तथा गर्म मौसम ने अनेक खरीफ फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसमें अरहर, उड़द और मूंग प्रमुख हैं। सोयाबीन और मूंगफली के उत्पादन पर भी असर पड़ा है। अरहर के उत्पादन में पिछले दो दशकों में, खासकर उत्तर प्रदेश में कमी होती गई। इसके पीछे वजह मौसम ही नहीं, स्थानीय समस्याओं के साथ इनसे होने वाली आय का न होना भी है। अब किसान घाटे की कोई फसल उगाना नहीं चाहता। अरहर रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली दाल है, इसके बावजूद किसान अगर इसको बोने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं, तो उन कारणों को खोजे बगैर 2028 तक अरहर और अन्य दलहन के मामले में देश आत्मनिर्भर हो जाएगा, कहना मुश्किल है।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र सहित देश के तमाम राज्यों में सरकारों की तरफ से तिलहनी और दलहनी फसलों पर अधिक ध्यान दिए जाने के बावजूद इनके उत्पादन का लक्ष्य हासिल नहीं हो पा रहा। इसकी वजहों पर सरकारों को गौर करना चाहिए। अरहर, मूंग और उड़द के लिए अलग से फसल बीमा योजना शुरू करने की जरूरत है। इससे किसानों को प्रोत्साहन मिलेगा और वे निश्चित होकर अरहर यानी तुअर प्राथमिकता से बोने को तैयार हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि अरहर, मूंग और उड़द में लागत उतनी नहीं लगती, जैसी दूसरी फसलों के बोने और तैयार करने में लगती है। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि अगर दलहन की फसल छुट्टा जानवरों या मौसम की मार से बर्बाद हो गई, तो उसकी पूरी भरपाई शासन की तरफ से हर हाल में की ही जाएगी।

गौरतलब है कि इससे किसानों को जमीन अधिक उर्वर बनाने में मदद मिलेगी। अरहर की जड़ें मूसलाधार होती हैं। यह जमीन के नीचे की उर्वरता और कम पानी खींचकर भी तैयार हो जाती है। यह कृषि अनुसंधानों से पता लगाया जा चुका है। अरहर की पत्तियां झड़कर खेत की उर्वरता बढ़ाती हैं। ये सब अरहर की फसल उगाने के फायदे हैं, जिन्हें किसानों को प्रोत्साहन में समझाया जा सकता है। यानी इसे अपनाकर रासायनिक खादों की खपत में भी कमी लाई जा सकती।

राजस्थान दलहन और गुजरात तिलहन उत्पादन में अव्वल है। जिन वजहों से इन दोनों प्रदेशों में देश में सबसे ज्यादा दलहन और तिलहन का उत्पादन होता है, उन वजहों को गहराई से समझ कर जो प्रदेश दलहन और तिलहन उत्पादन के मामले में बहुत पीछे हैं, वहां ’प्रयोग’ के तौर पर राज्य सरकारों को लक्ष्य निर्धारित करके आगे बढ़ना चाहिए। भारत का किसान परंपरागत खेती को ही अभी प्राथमिकता देता है। तिलहन और दलहन की फसलों को वैज्ञानिक ढंग की खेती के रूप में किसानों को प्राथमिकता देनी चाहिए और इसके लिए उन्हें जिला स्तर पर प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए। इससे जहां उत्पादन बढ़ेगा वहीं पर खेती- किसानी के प्रति गांवों में जो अरुचि पैदा होती जा रही है, उसमें कमी लाने में मदद मिल सकेगी।

केंद्र सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती है। उसके लिए दलहन और तिलहन फसलों के उत्पादन पर जोर देकर इसे अमली जामा पहनाया जा सकता है। इससे जहां दालों को लेकर गांवों और शहरों में जो मारामारी के हालात अक्सर बनते रहते हैं, उससे निजात मिलेगी और दलहन के लिए करोड़ों रुपए का आयात जो हर वर्ष हो रहा है, उसे भी काफी हद तक कम या खत्म किया जा सकेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि केंद्र और राज्य सरकारें दलहन तथा तिलहन के उत्पादन को बढ़ाने में जमीनी समस्याओं से रूबरू होकर समाधान की दिशा में आगे बढ़ेंगी।        

(लेखक आकाशवाणी नई दिल्ली में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी हैं।)

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