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देश की सुरक्षा के लिये चुनौती लेह उपद्रव

By Vinod Johri • 20 Nov 2025
देश की सुरक्षा के लिये चुनौती लेह उपद्रव

लेह की हिंसा ने लद्दाख का पर्यटन उद्योग नष्ट किया है और वहाँ के जनमानस के जीवन यापन को संकट में दल दिया है। पहलगाम की घटना ने 50 प्रतिशत पर्यटन व्यवसाय को नुकसान पहुंचाया था, लेह की हिंसा में यह बढ़कर 80 प्रतिशत हो गया है। - विनोद जौहरी

 

लेह लद्दाख में हुए हिंसक उपद्रव ने पूरे देश को झकझौरा और बड़े स्तर पर अचानक हुई हिंसा ने सबसे पहले देश विरोधी विदेशी षड़यंत्रों के प्रति आगाह कर दिया। इस पर चर्चा करने से पहले यह समझना बहुत आवश्यक है की लद्दाख की 43000 वर्ग किलोमीटर अक्साई चीन और शक्स्गम वेली का भाग चीन के अनाधिकृत अधिपत्य में हैं इसलिए लद्दाख में हिंसक उपद्रव किसके हितार्थ हो सकता है। 

भारत सरकार के अनुसार, चीन पिछले छह दशकों से लद्दाख में लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर अवैध कब्जा किए हुए है। यह दावा भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा किया गया है और यह लंबे समय से चले आ रहे चीन द्वारा खड़े किए गए विवाद का प्रतिफल है। यह क्षेत्र मुख्यतः अक्साई चीन का भूभाग है, जो भारत का है, लेकिन चीन के अनाधिकृत अधिपत्य में है। 1963 में पाकिस्तान ने शक्स्गम घाटी के 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अवैध रूप से चीन को सौंप दिया था, जिस पर अब चीन का कब्जा है। भारत सरकार ने चीन के इन दावों को अवैध बताया है और सीमा के पास अपने बुनियादी ढांचे में सुधार पर ध्यान केंद्रित कर रहा है ताकि सामरिक और सुरक्षा जरूरतों को पूरा किया जा सके। 

भारत एलएसी को 3,488 किलोमीटर लंबा मानता है, जबकि चीन इसे लगभग 2,000 किलोमीटर ही मानता है। लद्दाख में भारत-चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा 1962 के युद्ध के बाद चीन द्वारा अवैध रूप से कब्ज़ा किए गए क्षेत्र का यह परिणाम है। अक्साई चीन के कुछ हिस्सों पर चीनी कब्ज़ा ऐतिहासिक या कानूनी दस्तावेज़ों द्वारा समर्थित नहीं है। लद्दाख क्षेत्र के दर्रे दुनिया के कुछ राजनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे दक्षिण एशिया, चीन और मध्य पूर्व को जोड़ते हैं। दक्षिण एशियाई देश इस क्षेत्र के माध्यम से मध्य एशियाई बाज़ारों तक पहुँच सकते हैं। उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और कजाकिस्तान जैसे देश यूरेनियम, कपास, तेल और गैस संसाधनों से समृद्ध हैं। मध्य एशिया से इस क्षेत्र के माध्यम से पाइप लाइन का निर्माण कर के भारत की  ऊर्जा ज़रूरतें भी पूरी की जा सकती हैं।

जबसे इस हिंसक आंदोलन के सूत्रधार सोनक वांगचुक की भूमिका सामने आई है और सुरक्षा एजेंसियां उन सूत्रों तक पंहुच रही हैं जो इन उपद्रवों के लिए जिम्मेदार हैं, यह चर्चा निरर्थक है की सोनम वांगचुक एक पुरस्कृत पर्यावरणविद या शिक्षाविद या समाजसेवी हैं, बल्कि यह स्पष्ट हो रहा है कि यह सब उनका झूठा आवरण था जिसके पीछे वह लंबे समय से विदेशी फंडों से देश को षड़्यंत्री फंदों में जकड़ रहा था। वांगचुक के विगत कुछ समय के बयान और वीडियो देखे जाएं तो वह लद्दाख में अरब स्प्रिंग जैसे आंदोलन पर जोर देने के साथ-साथ नेपाल में जेनरेशन जेड के विरोध प्रदर्शनों की प्रशंसा कर रहे थे। इसलिए यह कोई स्वाभाविक विद्रोह नहीं था, यह पहले से योजनाबद्ध था। जब वांगचुक गिरफ्तार हुए तब उनके सहयोगियों ने उनका महिमामंडन करते हुए उनकी गिरफ्तारी का विरोध किया था और एक ऐसा इकोसिस्टम सक्रिय हो गया था जो देश विरोधी ताकतों के आदेशों पर अपनी गतिविधियों को चला रहा था। परंतु जब से उनकी विदेशी फंडिंग के खुलासे हो रहे हैं, यह इकोसिस्टम धराशायी होता जा रहा है जिसका कारण केंद्र सरकार की राजनीतिक इच्छशक्ति और देश को अक्षुण्ण रखने की प्रतिबद्धता और किसी विदेशी दवाब में ना आने क्षमता है।

सीबीआई पिछले दो महीने से उनकी संस्था हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख और अन्य इकाइयों की फंडिंग की जांच कर रही है। आरोप है कि अवैध तरीके से विदेशी फंडिंग ली गई है। सूत्रों का दावा है कि फरवरी 2025 में वांगचुक की पाकिस्तान यात्रा ने भी खुफिया एजेंसियों के कान खड़े किए थे। 

हिंसा भड़काने में वांगचुक के अलावा कांग्रेस के कुछ स्थानीय नेताओं की भूमिका भी सामने आई है। लेह स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद में कांग्रेस के एक कांउसलर का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें वह भड़काऊ बयानबाजी कर रहे हैं और कथित तौर पर वह हिंसक प्रदर्शनकारियों की भीड़ में भी आगे नजर आए हैं।

सरकार ने 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा के लिए वांगचुक को ज़िम्मेदार ठहराते हुए राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। वांगचुक पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है।  

वांगचुक ने सैंकड़ों कनाल भूमि एक विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए कौड़ियों के दाम पर सरकार से ली, लेकिन वहां विश्वविद्यालय नहीं बना  और अंततः सरकार ने वापस ले लिया। उनके संगठन की गतिविधियों की भी जांच हो रही है। केंद्र सरकार ने वांगचुक की संस्था का एफ़सीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया है। मालूम हो कि गृह मंत्रालय ने 20 अगस्त 2025 को शो कॉज नोटिस जारी किया था और 10 सितंबर को ई-मेल के जरिए जवाब मांगा था। सूत्रों के अनुसार वांगचुक की संस्था ने 19 सितंबर को जवाब दिया, लेकिन जांच में कई गंभीर उल्लंघन सामने आए। अब लाइसेंस रद्द होने के बाद वांगचुक की संस्था न तो विदेशी फंडिंग ले सकेगी और न ही विदेश से आए पैसे का इस्तेमाल कर पाएगी। साक्ष्य बताते हैं कि वांगचुक और उनकी संस्थाओं से जुड़े कई बैंक खाते छिपाए गए हैं। एचआईएएल के 7 अकाउंट में से 4 घोषित नहीं हैं।  पिछले साल 6 करोड़ की डोनेशन इस बार 15 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।  इनमें 1.5 करोड़ रुपये से ज्यादा की विदेशी रकम बिना एफ़सीआरए रजिस्ट्रेशन के आई।  एसईसीएमओएल के 9 खातों में से 6 घोषित नहीं हैं। शेसियन इन्नोवटीओन्स प्राइवेट लिमिटेड में एचआईएएल से सीधे 6.5 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए। खुद वांगचुक के 9 पर्सनल अकाउंट मिले, जिनमें से 8 घोषित नहीं थे। 2018 से 2024 तक अलग-अलग खातों में 1.68 करोड़ रुपये की विदेशी रकम आई।  2021 से 2024 के बीच उन्होंने अपने निजी खातों से 2.3 करोड़ रुपये विदेश भेजे। वांगचुक कॉर्पोरेट सेक्टर की आलोचना करते रहे हैं, लेकिन रिकॉर्ड दिखाते हैं कि उनकी संस्थाओं ने कई बड़ी कंपनियों और सरकारी पीएसयू से सीएसआर फंड लिया। 

लेह अपेक्स बॉडी की यूथ विंग ने बुधवार को लेह बंद का एलान किया था। शहीदी पार्क में धरना शांति पूर्ण शुरू हुआ, लेकिन दोपहर होते-होते अचानक वहां युवाओं का हुजूम पहुंच गया। युवाओं ने ’वी वांट सिक्स्थ शेड्यूल’ के नारे लगाते हुए तोड़फोड़ शुरू कर दी। केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्ज़ा देने की मांग को लेकर हुआ विरोध प्रदर्शन हिंसक हो उठा और भीड़ ने लेह में बीजेपी कार्यालय में आग लगा दी। 

पुलिस के अनुसार, “दिल्ली में प्रारंभिक वार्ता की योजना पहले ही बन चुकी थी लेकिन इससे पहले एक अनशन शुरू किया गया। इसे एक ऐसा मंच बनाया गया जहां शांति और कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने वाले तत्वों को आमंत्रित किया गया। एक बड़ा समूह इकट्ठा हुआ और उसमें बड़ी संख्या में असामाजिक तत्व शामिल होगए। 5000-6000 लोगों के एक समूह ने मार्च किया और सरकारी इमारतों और पार्टी कार्यालयों को नुकसान पहुंचाया। उन्होंने पथराव किया और सुरक्षाबलों पर हमला किया।

लेह-लद्दाख में उपद्रव कैसे हुआ, इसकी एक-एक परत खुलकर सामने आ रही है।  इतनी भीड़ एक साथ कहां से आ गई? कैसे सिर्फ कुछ विशेष  लोगों को निशाना बनाया गया? चुन-चुनकर दफ्तरों में आग लगाई गई।  सुरक्षा सूत्रों की मानें तो लेह हिंसा  का नेपाल कनेक्शन भी है। नेपाली  नागरिकों और नाबालिगों  को बुलाया गया। उन्हें उपद्रव करने के लिए  भड़काया गया।  

इस हिंसा को निस्संदेह अचानक कहा जाए, लेकिन पिछले कुछ समय से जिस तरह से वहां स्थानीय-बाहरी के मुद्दों को तूल दिया जा रहा है, उससे कोई भी कह सकता है कि हिंसा भड़की नहीं बल्कि लेह में अरब स्प्रिंग और नेपाल के जेनरेशन जेड जैसी स्थितियां पैदा करने के लिए भड़काई गई है, क्योंकि लद्दाखियो की विभिन्न मांगो को पूरा किया जा चुका था और राज्य के दर्जे व छठी अनुसूची को लेकर बने गतिरोध को दूर करने के लिए भी अगले माह बैठक होने जा रही थी। लद्दाख में चार जिलों के गठन की प्रक्रिया अपने अंतिम दौर में हैं जबकि लद्दाख में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण 45 प्रतिशत से बढ़ाकर 84 प्रतिशत किया गया है। पंचायतों में महिलाओं के लिए 1/3 आरक्षण दिया गया है। भोटि और पर्गी को आधिकारिक भाषा घोषित किया गया है। इसके साथ ही 1800 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया भी शुरू की गई। अलग लोकसेवा आयोग के गठन पर भी विचार किया जा रहा है और यह सब केंद्रीय गृहमंत्रालय द्वारा गठित हाई पावर कमेटी के साथ समझौतों का ही परिणाम है।

लेह की हिंसा ने लद्दाख का पर्यटन उद्योग नष्ट किया है और वहाँ के जनमानस के जीवन यापन को संकट में दल दिया है। पहलगाम की घटना ने 50 प्रतिशत पर्यटन व्यवसाय को नुकसान पहुंचाया था, लेह की हिंसा में यह बढ़कर 80 प्रतिशत हो गया है। पर्यटन संगठनों ने चिंता व्यक्त की है। केंद्र सरकार को इस अशांत हो उठे क्षेत्र में शांति का माहौल बनाए रखने और देश विरोधी शक्तियों के दंडित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। यह देश की सुरक्षा का प्रश्न है।     

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