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आखिरकार कब सुधरेंगे किसानों के दिन

By Dr. Dinesh Prasad Mishra • 28 Oct 2022
आखिरकार कब सुधरेंगे किसानों के दिन

एकतरफ जहां किसान खेती की लागत की महंगाई से परेशान हैं तो दूसरी ओर आंकड़े भी बता रहे कि खेती फिर घाटे का सौदा साबित हो रही है। — डॉ. दिनेश प्रसाद मिश्र

 

पिछले एक साल में डीजल औसतन 15 से 20 रू. लीटर महंगा हुआ, तो पेस्टिसाइड और बीज की कीमतों में 10 से 20 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है। राष्ट्रीय आय के अनुमानित आंकड़े भी बढ़ती लागत की तरफ ही इशारा करते हैं। खेती में इस्तेमाल होने वाले डीजल, खाद, उर्वरक और कीटनाशकों के रेट में पिछले एक साल में 10 से 20 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जनवरी 2021 से जनवरी 2022 के बीच डीजल औसत 15 से 20 रू. लीटर महंगा हुआ है, जबकि एनपीए उर्वरक की 50 किलो की बोरी 265 से 275 रू. महंगी हुई है, साल 2022-23 के लिए गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में मात्र 40 रू. प्रति कुंतल और पिछले साल के लिए धान की एमएसपी में मात्र 72 रू. प्रति कुंटल की बढ़ोतरी हुई थी। जबकि इस दौरान कीट, रोग और खरपतवारनाशक दवाओं में 10 से 20 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है। खेती की बढ़ती लागत के अलावा किसान एमएसपी के कम रेट पर बिकती फसलों से भी परेशान हैं। यूपी के चित्रकूट जिले में गेहूं में छिड़काव के लिए यूरिया लेने वाले किसानों का कहना है कि खेती में ऐसा है कि एक कुंटल धान बेचकर एक कोई उर्वरक की एक बोरी (50 किलो) भी नहीं खरीद सकते। बस किसी तरह काम चल रहा है। एमएसपी कुछ भी हो, हमने तो 1000 रू. में धान बेचा था। डीएपी की सरकारी कीमत कुछ ओर होती है, बाजार में किसी ओर दाम में मिलता है। इसलिए खेती की लागत में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, लेकिन फसल के दाम नहीं बढ़े हैं। महंगाई का आलम यह है कि गन्ने की फसल में खरपतवार मारने की दवा पिछले साल जो 100 रू. थी, इस साल 200 रू. की हो गई है। जबकि 5 साल में सिर्फ 25 से लेकर 35 रू. कुंटल ही बढ़ा हैं, यानी 5 रू. प्रति कुंतल। इसे खुद ही समझा जा सकता है। बांदा के किसान राममूरत बताते हैं कि खेती करना अब कहीं से भी लाभकारी नहीं है, चूंकि हमारे पूर्वज खेती से जुड़े रहे हैं इसलिए हमारा परिवार मजबूरी में ही खेती में लगा हुआ है।

एकतरफ जहां किसान खेती की लागत की महंगाई से परेशान हैं तो दूसरी ओर आंकड़े भी बता रहे कि खेती फिर घाटे का सौदा साबित हो रही है। 7 जनवरी 2022 को आये राष्ट्रीय आय के अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक कृषि क्षेत्र में उत्साहजनक 4 प्रतिशत की ग्रोथ हुई, लेकिन गैर कृषि क्षेत्र में औसत ग्रोथ 10 फ़ीसदी के आसपास है। पिछले साल की अपेक्षा यह बहुत अच्छी है, जिस पर सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है। राष्ट्रीय आय अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2022-23 में कृषि सकल मूल्य में स्थितिकारक 5.2 फीसदी बढ़ेगा, जबकि गैर कृषि (जीबीए) इसकी तुलना में लगभग दोगुनी दर से बढ़ेगा। गैर कृषि (जीबीए) में उद्योग और सेवाओं को शामिल किया जाता है। गैर कृषि क्षेत्र में उच्च मुद्रास्फीति के कारण दो वर्ष बाद किसानों के लिए इस वर्ष खेती फिर नुकसानदायक साबित होने वाली है। बढ़ती लागत ने किसान का बजट बिगाड़ दिया है। कृषि और दूसरे क्षेत्र के आंकड़ों के अंतर का सीधा सा मतलब है कि किसान ने खेती से जितना कुछ कमाया है, उससे ज्यादा वो डीजल, पेट्रोल, खाद, उर्वरक, घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई से लेकर दवा तक में खर्च कर रहा है। भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद के मुताबिक पिछले 20 वर्षों में कृषि सेक्टर में 3.4 प्रतिशत से ज्यादा की ग्रोथ नहीं है। यह ग्रोथ ठीक है, बशर्ते कि आगे भी बनी रहे। खेती की दूसरे सेक्टर से सीधा तुलना नहीं करना चाहिए, क्योंकि खेती बहुत जोखिम भरा और कुदरत का धंधा है। अगर किसानों को फसल की अच्छी कीमत मिले तो खेती से जुड़े लोगों का हित हो सकता है। देश के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि किसानों की फसल की अच्छी कीमत मिले तो उनका लाभ होगा। खेती में बढ़ती लागत और मुनाफे के मोर्चे पर किसान की आय का मतलब है कि लागत निकालकर, फसल बेचकर जो आमदनी हो। समस्या है कि लागत ज्यादा है। दूसरी तरह किसानों की लड़ाई है कि लागत बढ़ रही है और हमें जो मिल रहा है उससे किसानों का कोटा पूरा नहीं हो रहा है। जब तक खाद्य पदार्थों की कीमतें नहीं बढ़ेगी, तो किसान की आमदनी कैसे बढ़ेगी? लेकिन समस्या यह है कि सरकार फूड इन्फ्लेशन की अनुमति नहीं दे रही है। कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसके समाधान के दो तरीके हैं या तो आप उसी खेती से ज्यादा उत्पादन करें, जो कि कम समय में संभव नहीं है। क्योंकि देश में उस तरह की बीज तकनीकी और एक्सटेंशन नहीं है, या तो जो पैदा हो रहा है उसकी अच्छी कीमत नहीं है। लेकिन इसके अलावा भी कई तरह की समस्याएं हैं। न खेत बढ़ सकते हैं, न तुरंत सिंचाई का रकबा बढ़ाया जा सकता है। ऐसे में मंडियां बहुत जरूरी है। इसलिए भी मंडियों को ठीक किया जाना प्राथमिकता में होना चाहिए। किसान ज्यादा पैदा करके अपनी कीमत निकाल ले, इसमें समस्या नहीं है। असली समस्या तब आती है, जब किसान के खेत से निकलते ही इन चीजों के दाम गिर जाते हैं। देश में सबसे ज्यादा गेहूं और धान पैदा होता है, जिसका औसत रेट खुले बाजार में 1000 से 1500 के बीच रहा है। व्यापारी उन्हें उचित मूल्य नहीं देते। महाराष्ट्र के कई जिलों के किसानों ने व्यापारियों को पपीता देना बंद कर दिया था, क्योंकि व्यापारी किसान के खेत में 3 रू. किलो के रेट से पपीता खरीद रहे थे, जबकि पपीता उगाने में ही किसानों की लागत 5 से 6 रू. किलो आती है।

एनएसओ की रिपोर्ट भी बताती है कि किसान की आमदनी में फसलों से आने वाली आमदनी घटी है। सरकार के कृषि और लागत मूल्य आयोग के का भी अनुमान है कि किसानों की आय बढ़नी चाहिए। मालूम हो कि इसी आयोग की सिफारिश पर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय होता है।

किसान के घर में होने वाली आय का एक बड़ा हिस्सा मजदूरी से मिलने वाली आय होती है। भारत में जहां 67 फ़ीसदी आबादी अभी गांव में रहती है, वहां की एक बड़ी आबादी रोजगार और आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है। आबादी बढ़ रही है। शहरीकरण और पारिवारिक बंटवारे में जमीन और खेत बंट रहे हैं। भारत में 42.26 प्रतिशत लोग रोजगार के लिए कृषि पर निर्भर हैं, जो कि पाकिस्तान चीन से भी बहुत अधिक है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के साल 2021 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 42.6 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं। जबकि पाकिस्तान में आंकड़ा 36.92 और चीन में 25.2 है। वहीं कनाडा में 1.5 है, जबकि अमेरिका में महज 1 प्रतिशत लोग खेती से अपना रोजगार चलाते हैं। वहीं चीन, अमेरिका, कनाडा में सर्विस सेंटर जैसे दूसरे क्षेत्रों में ज्यादा लोग शामिल है।

पिछले 15 वर्षों में लोहा, ईंट, सरिया, सीमेंट जैसे सभी सामानों की महंगाई 20 से 30 गुना बढ़ी है, जबकि किसानों की फसलों की महंगाई मात्र 5 गुना। इस लिहाज से भी किसान 15 से 20 गुना माइनस में है। कभी खेती को मान-सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब स्थिति यह है कि किसी किसान के बेटे की नौकरी लग रही होती है और पैसे की जरूरत हो तो वह खेत भी बेच देता है। किसान बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी जमीन बेचने लग गया हैं। खेती से पलायन जारी है। डीजल से लेकर सोने तक की महंगाई को गिनाते हुए किसान हमेशा परेशान है। अधिकतर किसानों का कहना है कि अगर रवैया यही रहा तो धीरे-धीरे खेती खत्म ही हो जाएगी और खाद्य सुरक्षा का पूरा मामला कारपोरेट के हाथ में चला जाएगा। गरीब और गरीब, अमीर और अमीर होगा। आमदनी बढ़ाने का वादा था, लेकिन यहां तो लगातार आमदनी कम हो रही है। फसलों की लागत के मुकाबले न तो एमएसपी है और न ही बाजार भाव। ऐसे में घाटा तो होना ही है। केंद्र की वर्तमान सरकार ने किसानों के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाया है। किसान सम्मान निधि के जरिये छोटी जोत के हाथ में भी पूंजी तरलता  पहुंची है। सरकार को मंडियों की व्यवस्था पर जोर देना चाहिए ताकि किसान अपनी फसल बेच सके। एक स्वागतयोग्य कदम उठाते हुए सामान्तर खुली मंडियों का प्रावधान किया था, पर स्वार्थी राजनैतिक ताकतों ने दबाव बनाकर गुमराह किया। इससे छोटे किसान मझधार में ही फंसे रह गये हैं। क्योंकि बड़ी सरकारी मंडियों तक उनकी पहुंच नहीं है। इसलिए वे साहूकारों के हाथों अपनी फसल बेचने को मजबूर है।

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