इसमें कोई दोराय नहीं कि वर्तमान के प्रदूषण संकट और लगातार बिगड़ते जलवायु के लिए विकसित दुनिया दोषी है लेकिन विकासशील देश प्रमुखता से इस बात को लेते हुए जब तक अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन नहीं करेंगे, प्रदूषण का जहर कम होने की बजाय बढ़ता ही जाएगा। - डॉ. दिनेश प्रसाद मिश्र
पिछले कई हफ्तों से दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण के चलते लोगों का हाल बेहाल हो रहा है। कई एक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय पर्यावरण रिपोर्ट्स के ताजा आंकड़ों से यह निकलकर आया है कि दिल्ली एनसीआर, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और बिहार इस समय दुनिया के सबसे प्रदूषित इलाकों में शामिल है, जहां एयर क्वालिटी इंडेक्स लगातार 400 से 800 के बीच दर्ज किया जा रहा है। प्रदूषण की वजह से हवा में एअरोसॉल की मात्रा भी बढी है, इस कारण भारत के कई क्षेत्रों में पर्याप्त धूप नहीं पहुंच पा रही है। पश्चिमी तट, हिमालय क्षेत्र, दखिन के पठारी क्षेत्र और पूर्वी तट के इलाकों में धूप के घंटे लगातार काम हो रहे हैं। भारत के मौसम विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों के वर्ष 1988 से वर्ष 2023 के बीच भारत के 9 भौगोलिक क्षेत्र के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला है कि दुनिया भर में प्रदूषिण देश की सूची में भारत का स्थान अव्वल है। दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में 13 भारत में है। खासकर देश की राजधानी दिल्ली लगातार छठवें साल भी दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बनी हुई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वातावरण में एरोसॉल की मात्रा बढ़ाना इसकी मुख्य वजह है, एरोसॉल हवा में मौजूद धूल कालिख और राख जैसे कणों को कहा जाता है, जो हवा में तैरते रहते हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि दिल्ली का आम वासिंदा प्रतिदिन 18 से 20 सिगरेट पीने के बाद का प्रदूषण मजबूरी में प्रतिदिन झेल रहा है।
विषय के विशेषज्ञों के अनुसार दिल्ली एनसीआर में व्याप्त प्रदूषण बच्चों, बुजुर्गों और गंभीर रोगियों के लिए घातक है, जबकि सामान्य व्यक्ति भी इसकी चपेट में तेजी से आ रहे हैं। प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के कारण नगर के अस्पताल खचाखच भरे हुए हैं। कई एक वैश्विक पर्यावरण संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषण भारत के उत्तरी बेल्ट विशेष रूप से दिल्ली, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुड़गांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद, पटना और लखनऊ में दर्ज किया जा रहा है। अनेक इलाकों में एयर इंडेक्स 700 के पार पहुंच गया है। कहां गया है कि आज दुनिया में 60 करोड़ से अधिक लोग विषैली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर हैं।
इन क्षेत्रों में हर साल प्रदूषण के कारण की पड़ताल करते हुए कहा गया है कि सिंधु गंगा के मैदानी इलाकों में उत्तर भारत का यह विशाल समतल क्षेत्र शामिल है जो पश्चिम में पंजाब और हरियाणा से शुरू होकर दिल्ली, पश्चिम मध्य पूर्वी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के तराई इलाके बिहार, झारखंड और पूर्वी दिशा में पश्चिम बंगाल तक फैला है। इसमें दक्षिण की ओर जाते हुए उत्तरी-मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से भी शामिल हो जाते हैं कि सीमा रेखा में जनसंख्या घनत्व शहरीकरण उद्योग और वहां दबाव कृषिगत विधियां और फसल अवशेष जलाने के मामले प्रदूषण के लिए विशेष रूप से जिम्मेवार हैं। यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से प्रदूषण की चपेट में फंसने के लिए अत्यधिक संवेदनशील है क्योंकि उत्तर में हिमालय की दीवार की तरह खड़ा है, जो प्रदूषित हवा और धूल कणों को उत्तर की ओर बहने नहीं देता। दूसरी ओर मैदान का अत्यधिक समतल होना हवा के प्रवाह को धीमा कर देता है।
पृथ्वी नामक ग्रह पर भारत ही ऐसा भू-भाग रहा है जहां के निवासियों को सबसे ज्यादा धूप मिलती रही है। लेकिन हाल के बरसों में प्रदूषण में हुई गुणात्मक वृद्धि के कारण धूप की उपलब्धता कम हो रही है। वर्ष 2007 तक धूप की स्थिति पूर्व किस तरह सामान्य थी लेकिन साल 2008 के बाद से इसमें लगातार गिरावट हो रही है। भारत के मध्य क्षेत्र में सालाना 2449 घंटे धूप मिल रही थी, जो कि पहले की तुलना में 4.71 घंटे की गिरावट है।
भारत में सूरज की रोशनी और धूप की मात्रा में गिरावट गंभीर पर्यावरणी चुनौती का संकेत है इससे ऊर्जा कृषि स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
हालांकि भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में यह स्थिति कम देखने को मिलती है। गुवाहाटी और डिब्रूगढ़ के इलाकों में कुल मिलाकर देश के अन्य हिस्सों से स्थिति कुछ अच्छी है। वही हिमालय के क्षेत्र में पिछले 20 वर्षों में धूप के घंटे में 9.5 घंटे प्रति साल की दर से कमी दर्ज की जा रही है।
इसमें कोई शंका नहीं कि अचानक बड़े प्रदूषण के पीछे जलवायु परिवर्तन का भी असर है। इसका असर जीवन के हर क्षेत्र पर पढ़ रहा है। सबसे ज्यादा प्रभाव मानव के जीवन तथा खासकर किसान और उसकी कृषि पर है। सर्दियों का मौसम आते ही राजधानी दिल्ली सहित पूरे एनसीआर को धुआं, धुंध और जहरीले कानों का सामना करना पड़ता है परली का धुआं, दशहरा दिवाली के दौरान होने वाली आतिशबाजीपूरे दिल्ली और एनसीआर को जहर का चैंबर बना देती है जहां सांस लेना भी दुबार हो जाता है। दिल्ली की हवा अन्य जगहों की तुलना में 10 गुना जहरीली हो जाती है।जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया भर में बड़े-बड़े सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं लंबी चौड़ी बातें होती हैं लेकिन जमीन पर साल दर साल तापमान भी बढ़ रहा है प्रदूषण भी बढ़ रहा है और धूप लगातार घटती जा रही है। बड़े मंचों पर जब भी ग्लोबल वार्मिंग की बात होती है तो जीवाश्म ईंधन की बात शुरू हो जाती हैयह आता है बात है कि हम प्रकृति से जितना ही दूर होते जाएंगे हमारे जीवन में जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता भी उसी के अनुरूप बढ़ती जाएगी प्रकृति से इस दूरी के मूल में हमारा भोजन भी एक प्रमुख तत्व के रूप में शामिल है। आज वातावरण में प्रदूषण और गर्माहट जिस रफ्तार से बढ़ रही है उसे बदलने के लिए हमें अपने प्राचीन पद्धति का भी सहारा लेना ही होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान के प्रदूषण संकट और लगातार बिगड़ते जलवायु के लिए विकसित दुनिया दोषी है लेकिन विकासशील देश प्रमुखता से इस बात को लेते हुए जब तक अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन नहीं करेंगे, प्रदूषण का जहर कम होने की बजाय बढ़ता ही जाएगा। लगातार धूप की कमी से लोगों की जीवन प्रत्याशा भी घटेगी।

